बुधवार, 9 अगस्त 2017

क्रिकेट ,चुनाव और चैनल

क्रिकेट, चुनाव और चैनल
-इन्द्रजीत कौर
    जब कभी भारत की शस्य-श्यामला भूमि पर चुनाव हो रहें होतें हैं या किकेट जैसे खेल में यह धरा भाग ले रही होती है तो मीडिया की आँखें दिन चौगुनी रात सोलहगुनी गति से सिकुड़ जातीं हैं। कान के छेद छोटे हो जातें हैं। कई रिपोर्टर छुट्टी पर चले जातें हैं। कारण साफ़ है कि क्रिकेट-चुनाव की खबरों तक ही उन्हें खुद को समेटना होता है। सारे समाचार एक तरफ, जोरू के दोनों भाईयों के समाचार एक तरफ।
  दोनों ‘इवेंट’ के होने से पहले, होते समय और बाद में समाचार की अपार संभावनाएं नजर आतीं हैं। दोनों क्षेत्रों के धुरंधरों को बुलाया जाता है। चर्चाएँ की जातीं हैं।  देश के आधारखम्भों द्वारा मान-सम्मान-अपमानजनक बहसें होंतीं हैं। देश हिल जाता है। फलतः टी.आर.पी. भी उछालें लगाती है।
   ऐसे दौर में लगता है कि देश में बाकी सब कुशल-मंगल है। आलू–प्याज के रेट नहीं बढ़ रहें हैं।  बलात्कार और छेड़खानी की घटनाये नहीं घट रहीं हैं । कोई दुर्घटना-वुर्घटना नहीं हो रही है। सूखा- बाढ़ जैसे हालात भी नहीं हैं।  सिर्फ और सिर्फ क्रिकेट और चुनाव। सच, बड़ा फीलगुड होता है।
चैनल वाले चाहें तो दोनों विषय भाई के लिए एक ही प्रश्नावली तैयार कर सकतें हैं। अलग-अलग  मेहनत करने की जरूरत ही नहीं। इससे क्रिकेट और चुनाव के विश्लेषण विशेषज्ञता के साथ निपट सकतें है।  जैसे-
- आपको क्या लगता है कि कौन जीत सकता है? मतलब कि किसका पलड़ा भारी है?
- आपकी तैयारी पक्की है? आप पर आरोप है कि पिछली बार आपने प्रतिद्वंदी पक्ष के एक सदस्य को थप्पड़ जड़ा था और गालियाँ भीं दीं थी।  इस बार क्या सोचा है?
-आप देश का प्रतिनिधित्व भी करतें हैं और बिकते भी हैं।  दोनों में संतुलन कैसे बिठातें हैं?
- आपकी नजर में देश बड़ा है या पैसा?
- पूरे देश की नजरें खेल के परिणाम पर टिकीं हैं, उम्मीद है आप अच्छी तरह खेलेंगें। शुभकामनाएं।
यकीन मानों चैनल वालों, उपरोक्त प्रश्नों पर दोनों तरह के विशेषज्ञ मुस्कायेंगे। कोई पलट कर यह नहीं पूछेगा कि आपने राजनीति वाले प्रश्न खिलाड़ियों से क्यों पूछे या खेल वाले प्रश्न राजनीतिज्ञों से क्यूँ कर पूछ लिए?
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इन्द्रजीत कौर,