शनिवार, 10 अक्टूबर 2020

'किसान किस आन का'

आज जनवाणी में


किसान किस आन का ?
-इंद्रजीत कौर 
 जरा हमारे गाँव की तरफ ध्यान दे दो। लोन, सूखा, बाढ़ और मँहगाई हमें बर्बाद कर रही है। हमें आपकी नीतियों का विरोध करने के लिए दूध और सब्जियों को सड़क पर फेंकना पड़ रहा है। हो सकता है आपका लाडला इतिहासकार आज के बारे में यह लिख डाले- “बहुत पहले दूध की नदियाँ बहतीं थीं। बीच में सब ठप्प हो गया था। इक्कीसवीं सदी में अनोखी क्रांति आई। पुनः दूध की धाराएँ सड़क पर दिखने लगी। यही नहीं, सब्जियों के ढेर भी सड़क पर लगने शुरू हो गए थे। इतना उत्पादन हुआ इस काल में कि सब्जियाँ खेतों, मंडियों और लोगों के पेटों से भर-भराकर सड़क पर आ गईं थीं। यहाँ तक कि सड़कें भी कम पड़ गयीं थीं।” कोई संदेह नहीं कि कुछ लोग इसे स्वर्णिम युग भी कह दें। किसी को क्या पता कि इसके पीछे हमें अपनी आत्मा तक को मारना पड़ा है। सोचा कि आत्महत्या से तो पूरी जिंदगी चली जाती है, आत्मा-हत्या ही सही। आपका क्या है ? आप तो कह देंगें कि इस काल में किसानों की आत्महत्या में काफी ज्यादा कमी आई थी। रही बात आत्मा की, इसकी बात तो कभी इतिहास में होती ही नहीं। 
 साहिब! मेरे बच्चे ने पढ़ रखा है कि हर गाँव को सड़क से कभी जोड़ दिया गया था। पर महोदय, यह तो कहीं लिखा नहीं कि इस पर चल के गाँव शहर को जा रहा है लेकिन शहर गाँव में नहीं आ पा रहा है। मेरे ख्याल से सड़कें जाने का ही रास्ता बतातीं हैं, आने का नहीं। हमारी फसल शहर वालों का पेट भरने के लिए जाती तो हैं पर हम खाली हाथ ही रहतें हैं। वहाँ से हमारे लिए कोई सुविधा नहीं आती। यहाँ से ईंट, मिट्टी, पत्थर, लकड़ी शहर में पक्के मकान बनाने के लिए चली तो जाती है पर हमारा मकान कच्चा ही रह जाता है। बिल्कुल मिट्टी और फूस वाला। लेखकों को भले इसमें से लिखने के लिए माल मिल जाता हो पर हमारा जीवन तो मल मेँ ही रहता है। फिल्म वाले भी यहाँ की कहानी दिखा कर ईनाम-विनाम पा जाते हैं। करोड़ों रुपये कमा लेते हैं पर हममें मेँ से किसी एक का भी मकान बनाया हो तो बताओ।     
 सुना है कि हमारे लिए फिर से कई योजनायें बनाईं गईं हैं। ऐसी भी खबरें आईं हैं कि उन पर काम हुआ है। हर कार्यवाही के पूरे होने के कागज़ तो होगें ही। खैर, क्या फर्क पड़ता है? चलिए छोड़िये, कागज भी तो काग की तरह होतें हैं जो मुंडेर पर बैठकर काँव-काँव तो कर लेते हैं पर मेहमान के आने की गारंटी-वारंटी नहीं दे पातें। तेज आवाज़ की कांवाहट  से लगता है कि काम ज़ोरों से हो रहा है। बस, खुशफहमी दे रहें हैं मुए सत्तर सालों से। हाँ, इस भ्रम से मरते हुए को थोड़ी जिंदगी मिल जाती है। इसी ऑक्सीज़न के सहारे हम टिके हुये हैं। किसान का आन बस इतना ही तो है। है कि नहीं?  
 पता नहीं क्यों? विदेशी कम्पनी की कोल्ड ड्रिंक वाली बोतल तो हमारे गाँव में दिख जाती है पर अपने ही देश की योज़ना यहाँ क्यों नहीं पहुँच पाती? किसान के लिए बनी नीतियों का किस्सा सभी को पता है। गाँधी जी के अनुसार देश की आत्मा गाँवों में बसती है। आत्मा को मारकर ही आगे बढ़ने का समय है। यह काम ज़ोरों से चल रहा