सोमवार, 7 दिसंबर 2020

आओ dhokha-dhokha खेलें

आज जनसंदेश टाइम्स में

आओ धोखा-धोखा खेलें
-इंद्रजीत कौर 
 हालाँकि सदियों से धोखा देने का कार्य गलत माना जाता रहा है। धर्मग्रंथ, वेद-पुराण और प्रवचनों में भी विश्वासघात की बुराई की गयी है। यहाँ तक कि ‘धोखा’ शब्द खुद भी हमे आगाह करता है कि ‘धो’ और ‘खा’। इसके बावजूद वास्तविक दुनियाँ में ‘धोखा’ एक पवित्र और संस्कारी कार्य हो गया है। अधिकांश महत्वपूर्ण लक्ष्यों का यह शुभ-मंत्र बना हुआ है। कुछ लोगों के सधे हुये काम इससे भले बिगड़ जाते हों पर ज़्यादातर लोगों के बिगड़े काम इसी से ही सधते हैं।  इसे कई बातों से सिद्ध किया जा सकता है। 
  पहला, इसमें परोपकार कूट-पीस कर भरा होता है। प्रक्रिया यह है कि इस भावना को पहले कूट कर अधमरा किया जाता है। इसके बाद इसे पीस कर पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि और वायु के हवाले कर दिया जाता है। जो बची-खुची अपरोपकारी भावनायेँ रह जाती हैं उसी पर बैठकर धोखा दिया जाता है। इससे रास्ता साफ हो जाता है। कोई अड़चन नहीं आती।
 दूसरा यह कि धोखा देने से ध्वनि प्रदूषण भी नहीं फैलता। पहले से शोर मचाकर मज़ा खराब हो जाता है अतः यह झटके से दिया जाता है। इसकी ‘प्लानिंग’ झटके में नहीं होती। समय लगता है। श्रम करना पड़ता है। पसीना बहाना पड़ता है। गंदे नाले के ऊपर करीने से गुलाब की पंखुड़ियाँ बिछाई जाती हैं। इत्र छिड़का जाता है। धोखापावक को प्यार से बुला लिया जाता है फिर  अचानक छपाक...। हालाँकि कुछ लोगों को इस रहस्य का पता रहता है पर वे रहस्यमयी आत्मा की तरह अदृश्य और मूक बने रहतें हैं। वातावरण को ध्वनि प्रदूषण से मुक्त बनाए रहतें है। 
 ऐसे झटकों की तीव्रता रिएक्टर स्केल से नहीं मापनी चाहिए। मशीन खराब हो सकती है। भूकंप के भयानक झटकों से भी ऊपर इसकी जगह होती है। फर्क यह है कि इसके कारक भौगोलिक न होकर मनोवैज्ञानिक होते हैं। ये धरती रूपी शरीर के अंदर ही रहतें हैं जहाँ स्थिति धीरे-धीरे बनती है। आस-पास पता नहीं चलता और अचानक विस्फोट हो जाता है। 
 तीसरा और सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि धोखादेवक का अहं शांत होता है, भले वह रंक जैसा भी न हो पर राजा जैसा विजयी महसूस करता है। उसकी और उसकी मंडली की खुशी से राष्ट्रीय खुशी का सूचकांक ऊपर चढ़ जाता है। इससे प्रति व्यक्ति खुशी में भी वृद्धि हो जाती है। 
 ऐसा महापुरुष जिधर मर्जी उधर अपनी प्लास्टिक मुस्कान और रावणीय अट्टहास के साथ झुक जाता है। इसे बिन पेंदी का लोटा भी नहीं कहा जा सकता। लोटे में कमी यह रहती है कि अंदर चुल्लू भर पानी संभालने की क्षमता रख सकता है पर धोखादेवक बिना पेंदी के साथ छेदधारक भी होता है। एक बूंद पानी भी इसमें नहीं टिक पाता। बेपानी और रूखा-सूखा होकर अपनी कूटनीति बनाता है। व्यक्तिगत खुन्नस को सामूहिक बताकर अपने घेरे को बड़ा कर लेता है। फिर होती है धौखिक आक्रमण की तैयारी। इसमें साथ वाले भी कम नहीं होते। मिट्टी के गुड्डे-गुड़ियों की तरह उनके कंधे और चेहरे के बीच स्प्रिंग लगे रहतें हैं जो हर गलत-सही बात पर हँसते हुये सिर्फ ‘हाँ’ करते हैं। महापुरुष मुसकुराता है पर मन ही मन दहाड़े मारकर हँसता भी है। वो कितना भी छोटा हों, सुकून उन्हें आसमां से भी बड़ा मिल जाता है। 
 दूसरी तरफ धोखा पाना भी सौभाग्य की बात होती है। हाँ, शुरू में थोड़ा-बहुत ब्लड-प्रेशर, हार्टअटैक या डिप्रेशन जैसी समस्या रहती है (अब गुदगुदी तो होगी नहीं, हाँ, रिश्तों की लुग्दी जरूर बन जाती है।) पर आँखों के आगे धुंध छंट जाती है। स्वच्छता अभियान को बल मिल जाता है। कौन चुल्लू भर पानी में है और कौन सर-आँखों तक लबालब है, पता चल जाता है। भावनाओं के अर्श के बाद धोखापावक फर्श पर जरूर आ गिरता है, चोट-वोट भी लग जाती है पर बेज़मीर वालों से हटकर बाज़मीर और ज़मीन वालों से जुड़ जाता है। आँखें इतनी ज्यादा खुल जातीं हैं कि शीशे के आगे खड़ा होने पर आँखों के अंदरूनी भाग के अलावा कुछ दिखता ही नहीं।  जैसे - दूरदृष्टिदोष, नजदीक दृष्टिदोष, आँखों के पोरों से निकले स्नेह के आँसुओं के नमकीनी अवशेष, नज़रों के तीरों से प्राप्त दागों के नज़ारे, आँखों के जाले, आँखों में झोंकी गयी ‘शुगर कोटेड’ धूल आदि। ये सारी चीजें आगे के कदमों के लिए ‘अलार्म’ का कार्य करतें हैं। दूध का जला दूध की आइसक्रीम को भी फूँक-फूँक कर पीता है। ऐसी महान आँखखोलक गतिविधि के लिए धोखाखावक को धोखादेवकों का आभार प्रकट करना चाहिए। 
 
  इन्द्रजीत कौर