गुरुवार, 8 सितंबर 2022

आज जन सन्देश टाइम्स में

आम के देश में आम

 जब तक सूरज चाँद रहेगा, आम के देश में आम रहेगा। इस पंक्ति में भले ही दो शब्द एक जैसे हों पर अर्थ अलग हैं  - एक फल तो दूसरा जन । हाँ, विशेषताएँ काफी मिलती-जुलती हैं । जैसे, फल की तरह जन भी कुछ डाल के होते हैं और कुछ पाल के।  कुछ हरे दिखते हैं तो कुछ पीले , कुछ कच्चे रहते हैं तो कुछ पक जाते हैं। कुछ निर्धारित समय सीमा में पक जाते हैं तो कुछ पकते-पकते रह जाते हैं , कुछ को कार्बाइड देकर पकाया जाता है। कहीं-कहीं तो सभी का मिला-जुला रूप भी पाया जाता है पर यह देश ,काल और परिस्थिति पर निर्भर करता है। 
 दोनों ‘आम’ में प्रजाति की दृष्टि से भी काफी समानताएं हैं।  जैसे , लंगड़ा आम की तरह कुछ लोग भी लंगड़े होते हैं। यह लंगड़ापन शारीरिक से ज्यादा मानसिक होता है ।  जन्मजात और दुनियाजात भी । इसे पूरे मन से चूसा जाता है और कई बार चुसवाया भी जाता है । कुछ लोग दशहरी की तरह होते हैं , जो ज्यादातर राजधानी और इसके आसपास ही पाए जाते हैं । इनका हर दिन दशहरा जैसा होता है । शायद तभी ये दशहरी हो पाते हैं। होना लाजिमी भी है वरना  वो राजधानी ही क्या जहाँ  लोग दशहरी ना हो और वो दशहरी ही क्या जो राजधानी या उसके आसपास न रहते हों ?  ‘सफेदा’ टाइप के लोग  कितने भी पीले क्यों न हों अपना  नाम सफेदा ही रखते हैं । इनका छिलका और गुदा दोनों पीले होते हैं । ज्यादातर ठेलों पर ये सिर के बल पाए जाते हैं। निश्चित समय में इनका प्रयोग न हो तो ये पिलपिले हो जाते हैं। फिर भी आम से भरे बाज़ार के शोर में ‘सफेदा’ नाम इन्हें अलग मुगालते में डालता है । जब कि ‘हिमसागर’ प्रजाति का आम थोड़ा अलग होता है। बहुत मीठा होता है, वजनदार भी।  पर बाहर से हरा ही रहता है। इस फल की तरह आम जन भी कम होते हैं।  
 वहीं सिंधूरी आम जैसे कुछ लोग मीठे नहीं होते। परन्तु रंग के कारण इन्हें मीठा मान लिया जाता है। इसकी बनावट तोतापारी आम से मिलती -जुलती है। चूँकि नाम में तोता लगा है। इसलिए यह आमों की भीड़ में एक रट्टामारी आम ही है। कोई क्रांतिकारी टेस्ट इसमें नहीं होता। 
 इतनी प्रजातियों के बावजूद ज्यादातर लोग चौसा आम की तरह होते हैं । ये अच्छी और पूरी तरह चूसे जाते हैं । एकाग्रचित्तता के साथ। एक रेशा भी नहीं छूट पाता। अतः इसे सिर्फ आम भी कह दो तो कोई फर्क नहीं पड़ता। ज़रा किसी को चूसते हुए देखो तो जरा, चूसक आंखे फाड़कर अपने हाथों से गुठली के दोनों छोरों को पकड़ते हुए निर्दयता से चूसता है। ऐसा लगता है कि  राजा और प्रजा के रिश्तों को निभा रहा हो। कई चूसक तो इसे चूसने के बाद कड़ी धूप में सुखा देते हैं । अपने हिसाब से इस पर आकृति बनाकर रंग भर देते हैं । इसे तो कठपुतली बनाकर खेलते हुये भी देखा गया है।  खिलाड़ियों को बड़ा मज़ा आता है इस खेल में । शेक्सपियर का कथन यहाँ पूरी तरह झूठा हो जाता है कि ‘नाम में क्या रखा है?’ बल्कि अपना देसी मुहावरा ‘जैसा नाम, वैसा काम’ ही यहाँ ज्यादा सूट करता है।  
 एक महँगी प्रजाति ‘अल्फांसो’ नाम की भी पायी जाती है । फ़िल्म और औद्योगिक शहरों जैसे महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात आदि में पैदा होते हैं। ‘अल्फ़ान्सो’ नाम पुर्तगाल के मशहूर सैन्य रणनीतिकार ‘अफोन्सो दि अल्बूकर्क’ के नाम पर पड़ा है। अंग्रेजों की ये खास पसंद थे ।  इन्हें अन्य आमों पर राज़ करने की आदत हैं। इसीलिए जिनका विदेशी लिंक हो या जिन्हें राज-पाट में रुचि हो वे ही इन्हें खा पाते हैं।  इनकी खुशबू, भाव, रंग-रूप और उपलब्धता विशेष होती है। दशहरी, चौसा, देसी वगैरह इनके आगे पानी भरते हैं । इसके नाम में आम लगाना प्रजाति के साथ नाइंसाफी है  ।
 हालाँकि आमों की लगभग पंद्रह सौ प्रजातियाँ हैं पर सभी का जिक्र संभव नहीं है। इनका मानवीकरण करना हो तो कुछ प्रजातियाँ ही काफी हैं । जैसे फलां अपने आप को बड़ा अल्फ़ान्सो समझता था पर निकला निरा चौसा, चुनाव में इतनी मेहनत के बावजूद मंत्रालय में जगह नहीं मिल पाई । हो भी क्यों न ? ‘अल्फ़ान्सो’ व्यक्ति से नहीं पारिवारिक इतिहास से बनता है। उधर, राम सिंह को देखो , बैठे-ठाले मंत्री बन गया , आखिर उसके पूर्वजों ने ही मिलकर तो पार्टी बनाई थी। अब  नीरज जो जौनपुर में रहता है ।  लखनऊ आता-जाता रहता है पर दशहरी थोड़े बन जाएगा । लंगड़ा तो लंगड़ा ही रहेगा न। अनिल तो दिखने में ही सिंधुरी है पर मिठास कुछ खास नहीं । जबकि उसी का छोटा भाई पूरा हिमसागर है। बड़ा मीठा बोलता है, बातें भी वज़नदार करता है।  वो उदासी में नहीं जीता , हरा भरा बना रहता है। 
 इन उदाहरणों को परे करते हुये कितना ही अच्छा होता कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अल्फांसो, दशहरी, लंगड़ा जैसे लोगों की कीमत, मिठास और उपलब्धता का विकेंद्रीकरण हो पाता । खास के देश में आम होने के बजाय आम के ही देश में आम होता । 
- इंद्रजीत कौर,

शनिवार, 3 सितंबर 2022

पुरुष सशक्तिकरण वाया फिल इन द ब्लैन्कस


   पुरुष सशक्तिकरण वाया फिल इन द ब्लैंक्स

 ‘‘गुड मार्निंग सर्रर।’’
“सब लोग शांत...हाँ-हाँ ठीक है। सिट डाउन हो जाओ...।’’
 आदेश मिलते ही बच्चे धम्म से अपनी सीट पर बैठ गये। जो खाली बेंच पर किनारे बैठे, वे दूसरी तरफ से बेंच उठने से गिर गये। कुछ धकियाने की लत से भी इधर-उधर हो गए। हिंदी मीडियम विद्यालय के अंग्रेजी विषय की ‘किलास सेभेन’ में सर जी का प्रवेश होते ही यह दृश्य लगभग रोज रहता है। मास्साब बड़े धैर्य से ये सारी हरकतें देखतें रहतें हैं। 
“हाँ तो कल्ल हम क्या पढ़ा रहे थे?’’ बच्चों को अपने हाल पर छोड़ने के थोड़ी देर बाद मास्साब पूछ बैठे।  
“सर जी सब्जेक्ट-परेडीकेट...आज इस पाठ का फिल्ल इन द ब्लैंक्स करवाना है। सर जी, आपने कहा था सभी में परोनाऊन भरना है।’’ कक्षा के मानीटर ने उत्साह से जबाब दिया।
“ठीक है बुकवा लाओ।”
 मानीटर ने अपनी किताब दे दी। दो-चार और भी लड़के अपनी किताबें लेकर आगे आये थे पर मानीटर ने डांटकर भगा दिया। लड़कियों में ज्यादा उत्साह नही दिखा। वे चुपचाप पीछे बैठी हुईं नये एडमिशन वाली एक लड़की किताब लेकर उठी भी तो लड़के हाथ दिखाकर हँसने लगे। किताब पकड़े सकुचाते हुए अपनी जगह वह बैठ गयी। मास्टर साब गौरवान्वित थे कि उनके ‘किलास’ की लडकियां सभ्य और सुसंस्कृत परिवार से ताल्लुक रखतीं हैं। 
“चलो सभी लोग बुक खोल्लो...पेज नम्बर सेभेन्टी टू।’’
“जी क्या?’’
“गदहे सेभेन्टी टू...बहत्तर बहत्तर...।’’ इतना कहते हुए मास्टर साब ने उस बच्चे के दोनों कान जोर से उमेठे और “कितनी बार कहा है अंगरेजी का जमाना है इस शब्जेक्ट में मेहनत करा करो...बकलोल कहीं के” कहकर अपनी कुर्सी के पास आ गये।
“चल्लो...अब मैं फिल्ल इन द ब्लैंक्स वाले प्रश्न में भरने वाले शब्दों को बताऊंगा, तुमलोग अपनी कितबवा में नोट कर लेना, ठीक?’’ मास्टर साब ब्लैक-बोर्ड पर उत्तर बोलते हुए लिखने लगे, “देखो! पहला है खाली जगह यानि कि डैश-डैश फिर...इज वाकिंग ऑन द रोड। इसमें ‘ही’ भरौ।” इतना कहकर उन्होंने लड़कियों को एक बार देखा फिर लड़कों को।
 लड़के खुश और उत्साहित थे। इन्हीं में से एक लड़का ‘कमलवा’ बड़ा जिद्दी था। किसी के फटे में टांग अड़ाना उसे अच्छी तरह पता था। लड़कियों की तरफ तिरछी मुस्कान देखकर इसने पूछा, “सर सड़कवा पर लड़की भी तो टहल सकती है...‘सी’ परोनाउन लगाये से गलत हो जावेगा का?”
“सिट डाउन हो जाओ...स्साले! सड़किया पर तो लड़का ही टहलेगा न कि लड़की? बैट्ठो...’ही’ लिक्खो चुपचाप।’’ मास्टर साब ने कमर पर हाथ धर चारों तरफ देखकर पूछा, “सारे बताओ उत्तर क्या होगा ‘ही’ कि ‘शी’?’’ 
“हीईईईई...।” लड़कों की एक साथ आवाज गूँजी। लड़कियाँ शांत थीं फिर भी...। उन्होंने चुपचाप कापी में ‘ही’ लिख दिया।
 अध्यापक ने ‘राउंड’ लगाकर सभी की कापी देखी और ‘साबास’ कहकर आगे का काम करवाने लगे।
“हाँ, चलो मैं ब्लैक-बोर्ड पर बाकी फिल्ल इन द ब्लैंक्स लिख रहा हूँ, तुमलोग कापी पर उतार लेना...बीच में कोई चूं–चपड़ नहीं ठीक!! तुम लोग मेरे से ज्यादा नहीं जानते हो और न जान पाओगे।”  मास्टर साब ने ‘कमलवा’ को तेजी से घूरा और चाक-डस्टर उठाकर ‘ब्लैक-बोर्ड’ की तरफ मुँह कर लिया।
‘’हाँ दूसरा है खाली जगह यानि कि डैश-डैश फिर...ड्रिंक्स टू ग्लास ऑफ़ मिल्क डेली। इसमें लिखो ‘ही’। इसके बाद है...वाज रीडिंग न्यूज़ पेपर इन द मार्निंग और...इज प्लेइंग क्रिकेट। सभी में ‘ही’ डाल दो खटाखट...ठीक?” इतना कहकर वो हाथ से चाक झाड़कर विजयी मुद्रा में बैठ गए और खिड़की से बाहर देखने लगे। खुला आसमान और खुली धूप उनकी आँखों में चुभ गयी। उन्होंने खिड़की बंद कर शौचालय की दीवार की तरफ वाली खिड़की खोल ली। 
“सर जी सारे परोनावनों को उलट भी तो सकतें हैं?” कमलवा ने बड़े ताव से पूछा।
“मतलब?” 
“ही की जगह शी?”
“अरे भेवकूफ, गदहे रह जाओगे। घर में गिलास भर के दूध तुम पी जाते हो या तुम्हारी बहिनिया?...हाँ बोल्यो...।”
“जी हम्म्म...।”
“ठीक, तनि ये भी बताओ कि अखबार में किरकेट की खबर जो देखते हो, उसमें मर्द खेलतें हैं या औरत...मरद न? चलो सिट डाउन करो।”
“पर सर, न्यूझ पेपर वाली लाइन में तो शी भी भरा जा सकता है...?”
‘चल बैठ्य स्स्साले...जाकर अपनी अम्मा से पूछना कि अमरीका में इस समय क्या चल रहा है तो वह बता पायेंगी? नहीं न?...मंदी क्यों छा जाती है, इसका जबाब भी नहीं दे पाएंगी वो...औरी सुनो! अखबार आते ही तुम्हारे पापा पढ़तें हैं, मम्मी नहीं...ज्यादा बहसिया न करो...बाकि भी सब ठीके-ठाक है, जाने? जो समाज में हो रहा है, वही लिखो बिटवा...अरस्तु ने कहा है न कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है...चल्लो, जो लिखवाया है वो ही याद करो अगर अगली कक्षा में जाना है तो...समझे?”
 मास्टर साब के गुस्से से कक्षा में शांति छा गयी। कुछ देर बाद वो खड़े होकर कहने लगे, “चलो ‘शी’ वाला भी फिल्ल इन द ब्लैंक्स कर लो, तुमलोगों को शांति मिल जाएगी ठीईईक?” 
 मास्टर साब ने खटाक से पिछला लिखा मिटाया और अगला बोलकर लिखने लगे- “खाली जगह यानि डैश डैश...इज मेकिंग फ़ूड इन द किचन। दूसरा,...इज वीपिंग ऑन द रोड। दोनों में ‘शी’ भर दो झट से।...क्यों बे कमलवा अब खुश...?” 
“सर्रर जी, इन सारे सेन्टेंसों में हम ‘शी’ की जगह ‘ही’ नहीं भर सकते?’’ कमलवा ने इस बार झिझकते हुए पूछा।
“अब्बे चुप्प! नाम काट कर घर भेज देंगें...समझे कि नहीं...हमारा टीचर बनेगा तू?”  
 सारे बच्चों ने काम पूरा करके कापी मास्टर साब को दे दी। 
---++++---
इन्द्रजीत कौर

, मो.-7380739992