हिन्दी स्लीमिंग सेंटर में
आज मैं अपना मोटापा कम करने के चक्कर में स्लीमिंग सेंटर गयी, वहाँ पहले से मौजूद लोंगों को हाय किया। अचानक मेरी नज़र एक जगह जाकर ठिठक गयी। कुछ जाना पहचाना चेहरा लग रहा था। वो भी मुस्कुराते हुए मुझे देख रही थी। उसके हाव-भाव कुछ अपने-अपने से लगे। जब किसी ने आवाज दी कि ‘हिन्दी तुम कैसी हो?’ तो मेरा मुँह खुला का खुला रह गया। हिन्दी? यहाँ? मुझसे रहा नहीं गया। मैं सबको धकियाते हुए उसके पास पहुँची। गले लगाने के लिए जैसे ही आगे बढ़ी, उसने रोक दिया। बोली- “तुम हाथ मिलाओ तो अच्छा लगेगा। हाँ, दूर से ‘हेलो’ भी कह सकती थी। गले मिलना तो बीती बात हो गयी है। कहो, कुछ कहना था क्या?”
ऐसा रूखा जबाब सुनकर मुझे धक्का लगा। वह काफी बदल चुकी थी। उसमें अपनेपन का भाव ढूंढे नहीं मिला। मैं भी अड़ी रही और प्रश्नों की झड़ी लगाती रही, “इतनी पतली? क्यों? कैसे?” उसने हाथ चमकाकर जबाब दिया, “देखो ,मैने गरिष्ठ भोजन छोड़ दिया है। लोग मुझे लोकप्रिय बनाने के फिराक में थे तो मैं क्या करती? मुझे पतला होना पड़ा। भारी भरकम पहचान से दूरी बनानी पड़ी। हल्के-फुल्के अंदाज में जो सबको पसंद आ जाय, रहना पसंद करती हूँ। ज्यादा गरिष्ठता के घिरे होने के कारण कोर्इ मुझे समझ नहीं पाता था। सिर्फ पुस्तकालय तक सीमित थी। अब ऐसा नहीं है। मुक्त अर्थव्यवस्था ने इंडिया को बड़ा बाजार बना दिया है। मुझे हर जगह पहुँचना होता है। मोटापा लेकर कहाँ-कहाँ घुमूँगी? ग्लोबली पहचान बढ़ानी है। स्लिम होना जरूरी हो गया है ।(भर्राये गले से)...और भी सुनो, जब से मैने स्लीमिंग सेंटर आना शुरू किया है मेरी लोकप्रियता बढ़ी है। फिल्म, राजनीति, इंटरनेट आदि सब जगह मेरी मांग बढ़ी है।
उसका जबाब सुनकर मैं गुस्से से उबली। पूरे बल के साथ बोल पड़ी, ‘काहे की लोकप्रियता? तुम्हारी मौलिकता हटती जा रही है। अपनी जड़ से कटती जा रही हो। होश में आओ। तुम तो हमारी राजभाषा हो। पहले वाले रूप में ही तुम लोकप्रिय बनो, प्लीज़़़।’’ मेरी दहाड़ निवेदन में तब्दील हो चुकी थी पर उसके सिर पर जूँ तक नहीं रेंगी। इसके विपरीत उसने मेरे ही सिर पर जूँ डाल दी। मुझे समझाने की चेश्टा की, “आज के दौर में मेरा पहले वाला रूप मान्य नहीं होगा। सिर्फ ‘राष्ट्र’ शब्द आगे लगाने से क्या होता है? राष्ट्रीय पक्षी मोर आज अपनी जिन्दगी के लिये मोर-मोर कह रहा है। राष्ट्रीय गीत अब कुछ लोगों को साम्प्रयदायिक गीत लगने लगा है। राष्ट्रीय पंक्ति ‘सत्यमेव जयते’ के आगे सभी लोग ‘अ’ लगाने में जुटे हुये हैं। बापूजी भी आज के हालात देखें तो अपने आप को राष्ट्रपिता की जगह सिर्फ पिता ही कहलाना ज्यादा पसंद करेंगें।....अब तुम्हीं बताओ मेरे से इतनी उम्मीद क्यों? ऐसे दौर में मैं अपनी हड़प्पाकालीन जगह पर डटी रही तो मुझे ही दौरे पड़ने लगेंगे। फिर से पुस्तकालयों तक ही रहना पड़ेगा। अत: गरिष्ठ शब्दों से दूर ही नहीं, बहुत दूर हो गयी हूँ। भूल जाइये उस वक्त को, नर्इ हिन्दी अपनार्इये, आप भी मेरे साथ आइये। मुझे लोकप्रिय बनाइये।”
उसके इस आधुनिक उत्तर को सुनकर मैं राष्ट्र सा मुँह लेकर वापस आ गयी। हिन्दी अपनी मजबूरी में मजबूती ढूंढने के लिये स्लीमिंग सेन्टर में थी।
------------------------------------