रविवार, 13 सितंबर 2020

हिन्दी स्लीमिंग सेन्टर में

हिन्दी स्लीमिंग सेंटर में

आज मैं अपना मोटापा कम करने के चक्कर में स्लीमिंग सेंटर गयी, वहाँ पहले से मौजूद लोंगों को हाय किया। अचानक मेरी नज़र एक जगह जाकर ठिठक गयी। कुछ जाना पहचाना चेहरा लग रहा था। वो भी मुस्कुराते हुए मुझे देख रही थी। उसके हाव-भाव कुछ अपने-अपने से लगे। जब किसी ने आवाज दी कि ‘हिन्दी तुम कैसी हो?’ तो मेरा मुँह  खुला का खुला रह गया। हिन्दी? यहाँ? मुझसे रहा नहीं गया। मैं सबको धकियाते हुए उसके पास पहुँची। गले लगाने के लिए जैसे ही आगे बढ़ी, उसने रोक दिया। बोली- “तुम हाथ मिलाओ तो अच्छा लगेगा। हाँ, दूर से ‘हेलो’ भी कह सकती थी। गले मिलना तो बीती बात हो गयी है। कहो, कुछ कहना था क्या?” 
     ऐसा रूखा जबाब सुनकर मुझे धक्का लगा। वह काफी बदल चुकी थी। उसमें अपनेपन का भाव ढूंढे नहीं मिला। मैं भी अड़ी रही और प्रश्नों की झड़ी लगाती रही, “इतनी पतली? क्यों? कैसे?” उसने हाथ चमकाकर जबाब दिया, “देखो ,मैने गरिष्ठ भोजन छोड़ दिया है। लोग मुझे लोकप्रिय बनाने के फिराक में थे तो मैं क्या करती? मुझे पतला होना पड़ा। भारी भरकम पहचान से दूरी बनानी पड़ी।  हल्के-फुल्के अंदाज में जो सबको पसंद आ जाय, रहना पसंद करती हूँ। ज्यादा गरिष्ठता के घिरे होने के कारण कोर्इ मुझे समझ नहीं पाता था। सिर्फ पुस्तकालय तक सीमित थी। अब ऐसा नहीं है। मुक्त अर्थव्यवस्था ने इंडिया को बड़ा बाजार बना दिया है। मुझे हर जगह पहुँचना होता है। मोटापा लेकर कहाँ-कहाँ  घुमूँगी? ग्लोबली पहचान बढ़ानी है। स्लिम होना जरूरी हो गया है ।(भर्राये गले से)...और भी सुनो, जब से मैने स्लीमिंग सेंटर आना शुरू किया है मेरी लोकप्रियता बढ़ी है। फिल्म, राजनीति, इंटरनेट आदि सब जगह मेरी मांग बढ़ी है।
उसका जबाब सुनकर मैं गुस्से से उबली। पूरे बल के साथ बोल पड़ी, ‘काहे की लोकप्रियता? तुम्हारी मौलिकता हटती जा रही है। अपनी जड़ से कटती जा रही हो। होश  में आओ। तुम तो हमारी राजभाषा हो। पहले वाले रूप में ही तुम लोकप्रिय बनो, प्लीज़़़।’’ मेरी दहाड़ निवेदन में तब्दील हो चुकी थी पर उसके सिर पर जूँ तक नहीं रेंगी। इसके विपरीत उसने मेरे ही सिर पर जूँ डाल दी। मुझे समझाने की चेश्टा की, “आज के दौर में मेरा पहले वाला रूप मान्य नहीं होगा। सिर्फ ‘राष्ट्र’ शब्द आगे लगाने से क्या होता है? राष्ट्रीय पक्षी मोर आज अपनी जिन्दगी के लिये मोर-मोर कह रहा है। राष्ट्रीय गीत अब कुछ लोगों को साम्प्रयदायिक गीत लगने लगा है। राष्ट्रीय पंक्ति ‘सत्यमेव जयते’ के आगे सभी लोग ‘अ’ लगाने में जुटे हुये हैं। बापूजी भी आज के हालात देखें तो अपने आप को राष्ट्रपिता की जगह सिर्फ पिता ही कहलाना ज्यादा पसंद करेंगें।....अब तुम्हीं बताओ मेरे से इतनी उम्मीद क्यों? ऐसे दौर में मैं अपनी हड़प्पाकालीन जगह पर डटी रही तो मुझे ही दौरे पड़ने लगेंगे। फिर से पुस्तकालयों तक ही रहना पड़ेगा। अत: गरिष्ठ शब्दों से दूर ही नहीं, बहुत दूर हो गयी हूँ। भूल जाइये उस वक्त को, नर्इ हिन्दी अपनार्इये, आप भी मेरे साथ आइये। मुझे लोकप्रिय बनाइये।”
उसके इस आधुनिक उत्तर को सुनकर मैं राष्ट्र सा मुँह लेकर वापस आ गयी। हिन्दी अपनी मजबूरी में मजबूती ढूंढने के लिये स्लीमिंग  सेन्टर में थी।
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रविवार, 6 सितंबर 2020

आशीर्वाद को खोजत फिरै...


‘आशीर्वाद को खोजत फिरे’
-इंद्रजीत कौर  
भले ही ‘आशीर्वाद’ शब्द का किताबी अर्थ हिन्दी में ‘आशीष’ हो पर वास्तविक दुनियाँ में इसके कई अर्थ हैं जो किसी शब्दकोश में ढूँढे नहीं मिलेंगे। 
 जैसे एक ग्राहक द्वारा दुकानदार के आगे हाथ जोड़कर आशीर्वाद माँगने का मतलब है कि खरीदे गए सारे समान कम रेट पर या उधारी में मिल जाय। अगर वह बार-बार झुकता है तो इसका मतलब उधारी चुकता का बेवजह दबाव उस पर न डाला जाय। इसके विपरीत जब दुकानदार ग्राहक के सामने हाथ जोड़ता है तो वह उससे पिछला हिसाब माँग रहा होता है। हाथ जोड़ने के साथ दुकानदार अपना सिर भी नब्बे से पैतालीस अंश नीचे की तरफ धँसाने लगता है तो वह ग्राहक से पिछले कई वित्तीय वर्षों के हिसाब चाह रहा होता है। 
 जब एक कर्मचारी अपने अधिकारी से ‘आशीर्वाद’ माँगता है तो उसका अर्थ एकदम अलग हो जाता है। उसकी चाहत होती है कि बेवजह उसे छुट्टियाँ मिलतीं रहें और काम-काज से बचा रहे। उसका निठल्लापन फलता-फूलता रहे। ‘आशीर्वाद’ शब्द से अच्छा  यमक अलंकार का उदाहरण देखने को नहीं मिलता। यह अलग बात है कि हिन्दी व्याकरण में हम सभी ने बचपन से ही ‘सुवरन को खोजत फिरै, कवि, व्यभिचारी, चोर’ उदाहरण ही पढ़ा है और पचपन तक यही रटा है। इसमें ‘सुवरन’ का अर्थ क्रमशः कवि के लिए सुंदर शब्द, व्यभिचारी के लिए सुंदर रंग (स्त्री का) और चोर के लिए ‘स्वर्ण’ है। ‘आशीर्वाद’ शब्द की व्यापकता इतनी ज्यादा है कि अगर उपरोक्त उदाहरण में ‘सुवरन’ के स्थान पर ‘आशीर्वाद’ लिख दें तो यहाँ भी तीनों के अर्थ अलग और सटीक ही निकलेगे। 
 जैसे कवि श्रोताओं से आशीर्वाद माँगता है तो उसका अर्थ हो जाता है ढेर सारी तालियाँ। इसकी गड़गड़ाहट की गूँज उसे अमृत समान लगती हैं। यह गूँज कम होती है तो उसकी जेब नम नहीं हो पाती है। विश्व के इतिहास ने इस तरह के कवियों को गिरते तारों की तरह गायब होते देखा है। यदि कवि मंच से भी आशीर्वाद माँगता है तो वह कवि सम्मेलनों के ठेकेदारों से और ज्यादा मंच की माँग कर रहा होता है। ऐसी दशा में सभी मंचस्थों के हाथ उठ जाय तो उसकी बल्ले-बल्ले हो जाती है। अगर कवि संयोजक से भी दुआएं माँगता है तो वह अगली बार के आमंत्रण का दबाव उस पर डाल रहा होता है और अपने लिफाफे को भारी से भारीतर करवा रहा होता है। ऐसा न होने पर उसे अपनी जिंदगी भारी लगने लगती है।  
 वहीं व्यभिचारी के लिए ‘आशीर्वाद’ का अर्थ ‘खुली छूट’ होती है। वह कुछ भी कहे–करे, कोई रोके-टोके नहीं। स्त्रियाँ इसके सामने सर्वस्व अर्पण कर दे। ऐसा नहीं हो पाता तो व्यभिचारी के पास स्त्रियों से आशीर्वाद लेने के कई हथकंडे होते हैं। सुंदर स्त्री को देखते ही वे हाथ जोड़कर ‘देवी जी’ बोलेंगे नौर नब्बे डिग्री तक झुक जाएंगे। ‘नारी महिमा’, नारी सशक्तिकरण, नारी आत्मनिर्भरता आदि पर प्रवचन देते नहीं थकते भले ही उनके घर की स्त्रियाँ सात पर्दों के अंदर रहतीं हों। नारी मुक्तिकरण और स्वछंदता पर तो ये ज्यादा ही ज़ोर देते हैं। इन मुद्दों पर ऐसे वचनाते हैं जैसे ‘नारी’ विषय पर सारी प्रोफेसरी इन्होंने ही कर रखी हो। परिणामस्वरूप इन्हें खूब आशीर्वाद मिल जाता है।  
 चोर के लिए भी ‘आशीर्वाद’ का अर्थ थोड़ा अलग हट कर है। इससे पहले चोर का विस्तृत अर्थ जान लें तो बेहतर होगा। चोर सिर्फ वो नहीं होते जो ताले तोड़कर घर और दुकानों से कीमती समान चुरा ले जाय या राह चलते पर्स, चैन और गाडियाँ उड़ा ले जाय। इसका अर्थ इतना व्यापक है कि क्षितिज के इस पार भी है और उस पार भी...। घोटाला से घटतौली तक, टैक्सचोरी से टैक्स उड़ेनी तक, हिस्से वाले सभी किस्से तक, स्थानीय बैंक से विश्व बैंक तक के माल झपटने तक, स्पेस में स्पेस कब्जियाने तक आदि में चोरत्व के गुण विद्यमान है। इन्हें प्राप्त करने के लिए संबन्धित चोरों को संबन्धित आकाओं से आशीर्वाद मिलता रहता है और चोरी की पावन क्रिया दिन चौगुनी रात सोलह गुनी गति से दौड़ती रहती है। इस प्रकार मात्राओं पर ध्यान न दें तो यह भी कहा जा सकता है कि ‘आशीर्वाद को खोजत फिरे, कवि, व्यभिचारी, चोर।’ 
 ऐसी बात नहीं है कि आज की तिथि तक इस शब्द के जो अर्थ निकले हैं, वहीं रहेंगे।  भविष्य में इसके नए अर्थों की बाढ़ बहती रहेगी और हिन्दी भाषा समृद्ध होती रहेगी। बस यह काल, दिशा, दशा और ताकत पर निर्भर करेगी