‘आशीर्वाद को खोजत फिरे’
-इंद्रजीत कौर
भले ही ‘आशीर्वाद’ शब्द का किताबी अर्थ हिन्दी में ‘आशीष’ हो पर वास्तविक दुनियाँ में इसके कई अर्थ हैं जो किसी शब्दकोश में ढूँढे नहीं मिलेंगे।
जैसे एक ग्राहक द्वारा दुकानदार के आगे हाथ जोड़कर आशीर्वाद माँगने का मतलब है कि खरीदे गए सारे समान कम रेट पर या उधारी में मिल जाय। अगर वह बार-बार झुकता है तो इसका मतलब उधारी चुकता का बेवजह दबाव उस पर न डाला जाय। इसके विपरीत जब दुकानदार ग्राहक के सामने हाथ जोड़ता है तो वह उससे पिछला हिसाब माँग रहा होता है। हाथ जोड़ने के साथ दुकानदार अपना सिर भी नब्बे से पैतालीस अंश नीचे की तरफ धँसाने लगता है तो वह ग्राहक से पिछले कई वित्तीय वर्षों के हिसाब चाह रहा होता है।
जब एक कर्मचारी अपने अधिकारी से ‘आशीर्वाद’ माँगता है तो उसका अर्थ एकदम अलग हो जाता है। उसकी चाहत होती है कि बेवजह उसे छुट्टियाँ मिलतीं रहें और काम-काज से बचा रहे। उसका निठल्लापन फलता-फूलता रहे। ‘आशीर्वाद’ शब्द से अच्छा यमक अलंकार का उदाहरण देखने को नहीं मिलता। यह अलग बात है कि हिन्दी व्याकरण में हम सभी ने बचपन से ही ‘सुवरन को खोजत फिरै, कवि, व्यभिचारी, चोर’ उदाहरण ही पढ़ा है और पचपन तक यही रटा है। इसमें ‘सुवरन’ का अर्थ क्रमशः कवि के लिए सुंदर शब्द, व्यभिचारी के लिए सुंदर रंग (स्त्री का) और चोर के लिए ‘स्वर्ण’ है। ‘आशीर्वाद’ शब्द की व्यापकता इतनी ज्यादा है कि अगर उपरोक्त उदाहरण में ‘सुवरन’ के स्थान पर ‘आशीर्वाद’ लिख दें तो यहाँ भी तीनों के अर्थ अलग और सटीक ही निकलेगे।
जैसे कवि श्रोताओं से आशीर्वाद माँगता है तो उसका अर्थ हो जाता है ढेर सारी तालियाँ। इसकी गड़गड़ाहट की गूँज उसे अमृत समान लगती हैं। यह गूँज कम होती है तो उसकी जेब नम नहीं हो पाती है। विश्व के इतिहास ने इस तरह के कवियों को गिरते तारों की तरह गायब होते देखा है। यदि कवि मंच से भी आशीर्वाद माँगता है तो वह कवि सम्मेलनों के ठेकेदारों से और ज्यादा मंच की माँग कर रहा होता है। ऐसी दशा में सभी मंचस्थों के हाथ उठ जाय तो उसकी बल्ले-बल्ले हो जाती है। अगर कवि संयोजक से भी दुआएं माँगता है तो वह अगली बार के आमंत्रण का दबाव उस पर डाल रहा होता है और अपने लिफाफे को भारी से भारीतर करवा रहा होता है। ऐसा न होने पर उसे अपनी जिंदगी भारी लगने लगती है।
वहीं व्यभिचारी के लिए ‘आशीर्वाद’ का अर्थ ‘खुली छूट’ होती है। वह कुछ भी कहे–करे, कोई रोके-टोके नहीं। स्त्रियाँ इसके सामने सर्वस्व अर्पण कर दे। ऐसा नहीं हो पाता तो व्यभिचारी के पास स्त्रियों से आशीर्वाद लेने के कई हथकंडे होते हैं। सुंदर स्त्री को देखते ही वे हाथ जोड़कर ‘देवी जी’ बोलेंगे नौर नब्बे डिग्री तक झुक जाएंगे। ‘नारी महिमा’, नारी सशक्तिकरण, नारी आत्मनिर्भरता आदि पर प्रवचन देते नहीं थकते भले ही उनके घर की स्त्रियाँ सात पर्दों के अंदर रहतीं हों। नारी मुक्तिकरण और स्वछंदता पर तो ये ज्यादा ही ज़ोर देते हैं। इन मुद्दों पर ऐसे वचनाते हैं जैसे ‘नारी’ विषय पर सारी प्रोफेसरी इन्होंने ही कर रखी हो। परिणामस्वरूप इन्हें खूब आशीर्वाद मिल जाता है।
चोर के लिए भी ‘आशीर्वाद’ का अर्थ थोड़ा अलग हट कर है। इससे पहले चोर का विस्तृत अर्थ जान लें तो बेहतर होगा। चोर सिर्फ वो नहीं होते जो ताले तोड़कर घर और दुकानों से कीमती समान चुरा ले जाय या राह चलते पर्स, चैन और गाडियाँ उड़ा ले जाय। इसका अर्थ इतना व्यापक है कि क्षितिज के इस पार भी है और उस पार भी...। घोटाला से घटतौली तक, टैक्सचोरी से टैक्स उड़ेनी तक, हिस्से वाले सभी किस्से तक, स्थानीय बैंक से विश्व बैंक तक के माल झपटने तक, स्पेस में स्पेस कब्जियाने तक आदि में चोरत्व के गुण विद्यमान है। इन्हें प्राप्त करने के लिए संबन्धित चोरों को संबन्धित आकाओं से आशीर्वाद मिलता रहता है और चोरी की पावन क्रिया दिन चौगुनी रात सोलह गुनी गति से दौड़ती रहती है। इस प्रकार मात्राओं पर ध्यान न दें तो यह भी कहा जा सकता है कि ‘आशीर्वाद को खोजत फिरे, कवि, व्यभिचारी, चोर।’
ऐसी बात नहीं है कि आज की तिथि तक इस शब्द के जो अर्थ निकले हैं, वहीं रहेंगे। भविष्य में इसके नए अर्थों की बाढ़ बहती रहेगी और हिन्दी भाषा समृद्ध होती रहेगी। बस यह काल, दिशा, दशा और ताकत पर निर्भर करेगी
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें