आज दैनिक जागरण में
सेनीटाइजर बेचने वाला दूल्हा
-इन्द्रजीत कौर
जैसे ही मुझे बिचौलिये ने बताया कि दूल्हे की कीमत पाँच करोड़ है, मैं दंग रह गई। इतना कि दंगा करने को मन मचल उठा पर मन को नियंत्रित करना पड़ा। आँखें बंद करके पाँच बार गहरी सांसे ली और बोल पड़ी,
“पच्चीस साल तक बेटी को पाल-पोस कर बड़ा किया है। पढ़ाया-लिखाया भी है। अपना पेट काटकर पैसा लगाया है। लड़के की तरह अपनी लड़की को नौ महीने कष्टों के साथ पेट में रखा है। फिर भी? आप ये क्यों नहीं समझते कि दुल्हन ही दहेज है।”
अब दंग होने की उनकी बारी थी पर वो समझाऊ मुद्रा में बोले, “ बहन जी, दुल्हन को दहेज समझाने वाली बातें सहेज कर रखी ही कहाँ गईं। जैसी आई थी, वैसी ही फुर्र हो गई। अच्छी बातें तो अच्छे तरीके से फुर्र होने के लिए ही आती हैं। ये उस चमकीले पर्दे की तरह होती है जिसके पीछे कबाड़ और कचरा भरा होता है। जिंदगी भर आपकी बेटी की खाने-पीने, पहननें- ओढ़ने और घर में रखने की जिम्मेदारी कोई फ्री- फंड में तो लेगा नहीं। कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी। जितनी बड़ी हैसियत, उतनी बड़ी कीमत...ठीक्क?”
बिचौलिए ने दहेज की औचित्यता उचित तरीके से बता दी। मुझे बेटी की शादी तो करनी ही थी। कहा जाता है कि बेटी पराया धन होती है पर उससे पहले तो हमारा सारा धन ही पराया हो जाता है। वह समाज जिसे कभी अपने लिए खड़ा होते नहीं देखा, उसे मुँह भी तो दिखाना था। कल को सभी कहेंगे कि पैसे के कारण बेटी की शादी नहीं की। मैंने बिचौलिए से डिटेल लेनी शुरू कर दी,
“अच्छा बताओ लड़का करता क्या है? कहाँ का अफसर है? किस ग्रेड का है? सरकारी है या प्राइवेट? डाक्टर या पुलिस तो नहीं है?”
फायदे के द्वार खुलते ही बिचौलिया उछल पड़ा। मेढक की तरह? नहीं, मेढक तो कम जगह में ही उछलता-कूदता रहता है। ज्यादा इधर-उधर नहीं जाता। बंदर की तरह भी नहीं कह सकते। बंदर तो थोड़ा समझदार और ईमानदार भी होता है। हाँ, इतना कह सकते हैं कि बिचौलिया, बिचौलिये की ही तरह उछला और बोल पड़ा, “बहन जी चिंता की चिता में मत बैठिए। वो डॉक्टर या पुलिस नहीं है। सरकारी अफसर तो बिल्कुल भी नहीं जहाँ घूमने के लिए घोड़ा-गाड़ी तो मिल जाएगी पर घुटने के लिए दबाव भी कम नहीं मिलते, जिन्दगी भर अपने घुटने पर हाथ धर के बैठे रहो , बस।”
मैं आश्चर्य में डूब गई कि लड़के को पाँच करोड़ का दहेज किस बात का दूँ? कहीं वह लेखक तो नहीं? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। उसके लिए पाँच करोड़ तो क्या पाँच रुपये भी न दूँ। कहीं वह एक्टर तो नहीं जिसकी जिंदगी और मौत का भरोसा ही न हो। ना बाबा ना। ऐसा तो नहीं कि वह शोरूम या होटल-वोटल चलाता हो। नहीं-नहीं, बेटी पराया धन है पर देने के बाद छाया भी तो सदाबहार वाली चाहिए। कभी ईद तो कभी रोजा वाला सिस्टम बिल्कुल नहीं।
बिचौलिए ने शायद मेरा चेहरा पढ़ लिया था। उसने आराम से मुझे समझाया, “देखिये बहन जी, जिस लड़के को देखा है वह सैनिटाइजर बेचता है। पहले कम रेट पर खरीदकर ज्यादा रेट पर बेचता था। फिर अपनी दुकान खोल ली। बड़ा होनहार है। वह फैक्ट्री भी खोलने वाला है। लाइसेंस मिल गया है। अब वह शहर के दुकानों, नगर-निगम, ग्राम-पंचायतों और सरकारी दफ्तरों में भी सप्लाई करेगा। आस-पास के एरिये को भी कवर करेगा। आगे जाकर जरूरत पड़े तो चीन और अमरीका जैसे बाहरी देशों में भी बेच सकता है।”
मेरा मुँह खुला का खुला रह गया। आँखों में खुशी के आँसू कब आये, छलके और गालों पर निशान भी बना गये, पता ही नहीं चला। पूरी तरह आश्वस्त होकर मैने चैन की सांस ली। मेरी हालत देखकर बिचौलिये की आँखों में भी ‘मोटी नेग’ के आँसू आ गए।
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