आज राजस्थान पत्रिका मे पढ़े.
“मुझे आजादी चाहिए।”
“हमें तो उन्नीस सौ सैतालीस को ही अंग्रेजों से आज़ादी मिल गयी थी। फिर अब?”
“मुझे और आज़ादी चाहिए। आज़ादी मिलने के बाद कुछ नियम भी बना दिये गए, उसे संविधान कहा गया। मुझे इन नियमों से भी आज़ादी चाहिए, हाँ।”
“जीवन में कुछ नियम तो होने ही चाहिए, तुम इतनी ज्यादा आज़ादी लेकर क्या करोगे?”
“मुझे खुले आम सड़क पर गाली देने का मन करता है। लड़कियों को देखकर उन्हें छेड़ने का जी चाहता है। डाक्टरों, नर्सों, पुलिस, भीड़ आदि पर पत्थर फेंकने की इच्छा करती है। अपनी गाड़ी को सड़क के बीचों-बीच खड़ी करने को मन मचलता है। कोई टोके तो उसे ठोंकने को मैं हमेशा तैयार रहता हूँ। किसी को गोली से मारने का मन हो तो अपने मन को मार नहीं सकता। मन के हिसाब से देश के नियमों की किताब पलट देना चाहता हूँ। मन चंचल तो नियम भी चंचल, है न ?”
“इसे आज़ादी थोड़े कहतें हैं। पूरी आबादी ऐसे ही करने लगे तो हो गया बंटाधार! मन को काबू में रक्ख।”
“काबू? मन है तो है, बस। मुझे तो राह चलते इधर-उधर थूकने का भी मन करता है। खासकर जहाँ ‘थूकना मना है’ का बोर्ड लगा हो। कई बार ‘मना’ शब्द पर ही मैं पान की पीक ’पुच्च’ से फेंक देता हूँ। कितना मज़ा आता है, क्या बताऊँ? इसी तरह ‘जहाँ मूतना मना है’ लिखा होता है, वहाँ खड़ा होकर अपना काम जरूर कर देता हूँ। कितनी मुश्किलों से तो आज़ादी मिली है, इतना भी न करें तो धिक्कार है आज़ादी पर।”
“तो जानवरों और इन्सानों की आज़ादी में क्या फर्क हुआ? वह चार पैरों से चलता है और तुम दो पैरों से, बस।”
“मुझे जानवर न कहो। अतिमनुष्य कहो। नीत्से ने कहा है जो मनुष्य के आगे की सोचे वह अतिमनुष्य है। यही विकासवाद का सिद्धान्त है - बंदर, मनुष्य और अतिमनुष्य। हमें विकास करना है। आज़ादी चाहिए...और आज़ादी... और, और आज़ादी...बिना नियम वाली पूरी आज़ादी, हाँ।”
“जिन कामों के लिए तुम्हें और आज़ादी चाहिए, वे काम तो कुछ लोग दशकों से कर रहें हैं। किताबी नियमों से क्या होता है?”
वह शराबखाने चला गया। वहाँ से झूमते हुये निकला और सड़क पर जा रही एक युवती को घसीट कर अपनी गाड़ी में बिठा दिया। सड़क के बीचों-बीच पूरे स्पीड से उसने गाड़ी दौड़ायी। रास्ते में सुनसान जगह पर आधे घंटा रुका। युवती की कुछ चीखें निकलीं। अस्त-व्यस्त हालत में इसे बाहर फेंक कर वह युवक चल पड़ा। कुछ जगहों पर रोक कर अपने पास रखे पत्थर के टुकड़ों को डाक्टर, नर्स, पुलिस और भीड़ पर फेंका। आगे चलकर अपनी बंदूक निकालीं। गोलियों से दो-चार लोगों को भूना और घर जाकर पूरी तसल्ली के साथ गहरी नींद में सो गया।
अगली सुबह अचानक दहशत भरी तेज़ आवाज़ से उसकी नींद खुल गयी। सामने वाली दोनों खिड़कियों के शीशे टूट कर चकनाचूर हो गए थे। शोकेस में रखी क्रॉकरी फर्श पर टूटकर बिखरी हुयी थी। उसने धीरे से कदम आगे बढ़ाए पर पैर में टुकड़े चुभ ही गए। खून की धाराएँ बह निकलीं फिर भी लड़खड़ाते हुये उसने खिड़की से नीचे देखा। एक युवक सड़क के बीचों-बीच झूमते हुये चल रहा था। उसके हाथ में पत्थरों की थैली थी। वह चारों तरफ पत्थर फेंक रहा था। खिड़की से झाँकने वाला युवक थोड़ी देर शांत रहा फिर वह खूब तेजी से ’अरे,बहन...” चिल्लाया। इसके बाद उसके सिर पर भी एक पत्थर का टुकड़ा उछल कर लग गया। दिमाग सन्नाटे में चला गया और वह धम्म से नीचे गिर पड़ा। शायद उसने मंदिर जाती अपनी बहन को चीखते हुये देख लिया था जिसे पत्थर वाला युवक घसीट कर एक कोने में ले जा रहा था
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