महान पड़ोसी का सुख
-इंद्रजीत कौर
हमारा पड़ोसी महान है। कारण यह कि वो खुद को ऐसा समझता है। बातों को घूमा-फिरा कर कहना उसकी खानदानी परंपरा है। काम भी सीधे तरीके से नहीं करता। घूमा-फिरकर निपटाने की कोशिश करता है। काम खुद भी भूल जाता है कि वह किस दिशा और दशा में था और अब किस देश में है। पीठ के आगे-पीछे लोग चाहे कुछ भी कहें पर वो अपनी पीठ खुद ही थपथपा लेता है। कंधा पार करके पूरा हाथ पीठ पर नहीं जा पाता तो घूमा-फिरा ही इसे सहला देता है।
इससे गर्व और गर्भ, दोनों की अनूभूति होती है। उसे लगता है कि उसके अंदर बहुत सारी प्रतिभाएं पल रहीं हैं जिसे बाहर आना ही चाहिए। अगर पैर से टकराकर कोई कंकड़ एक तरफ हो जाय तो उसके मुँह से बोल फूट पड़तें हैं कि उसने रास्ते से पहाड़ हटा दिया है। एक कप चाय भी बनाता है तो मुझे मानना पड़ता है कि उसने घर में नाश्ता, लंच और डिनर तैयार किया है। ऐसी बातों पर मुझे ‘हाँ’ में ‘हाँ’ करना ही पड़ता है क्योंकि वो ‘हाँ’ की मुद्रा में सिर हिलाते हुये बात करता है। हर बात की समाप्ति पर ‘हैं न?’ और ‘है कि नहीं’ भी पूछता है।
यही नहीं, रात होने पर मेरी दीवार पर ठुक–ठुक करता है। मैंने कई बार आगाह किया। धमकाया। कोई असर नहीं। सुराख हो चुकें हैं। दोनों तरफ से छेद हैं तो मोहल्ले में इसका आरोप मेरे ही मत्थे मढ़ देता है। अपनी गाड़ी और गार्ड भी मेरे घर की हद में खड़ी करता है। कीड़ा, बिच्छू, कनखजूरा आदि निकल आए तो मेरे घर के आगे धीरे से सरका देता है। हम कुचल देते है फिर भी वह बाज नहीं आता है। उसका दिमाग खुराफ़ातों के लिए तो उपजाऊ है पर अच्छे कामों के लिए निपट बंजर।
मेरे पूर्वजों समेत पूरा परिवार लगभग सत्तर सालों से उसकी महान परंपरा को झेलते आ रहें है। कहीं से भी नहीं लगता कि वह मेरे ही परदादा की संतानों में से है। क्या करूँ? मेरे और मेरे देश की हालत एक जैसी ही है। ऐसा पड़ोसी कब तक और कितनी पीढ़ियों तक झेलना पड़ेगा, कुछ पता नहीं।
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