रविवार, 16 अगस्त 2020

सेनेटाइजर बेचने वाला दुल्हा

आज दैनिक जागरण में


सेनीटाइजर बेचने वाला दूल्हा

           -इन्द्रजीत कौर

 जैसे ही मुझे बिचौलिये ने बताया कि दूल्हे की कीमत पाँच करोड़ है, मैं दंग रह गई। इतना कि दंगा करने को मन मचल उठा पर मन को नियंत्रित करना पड़ा। आँखें बंद करके पाँच बार गहरी सांसे ली और बोल पड़ी, 
 “पच्चीस साल तक बेटी को पाल-पोस कर बड़ा किया है। पढ़ाया-लिखाया भी है।  अपना पेट काटकर पैसा लगाया है। लड़के की तरह अपनी लड़की को नौ महीने कष्टों के साथ पेट में रखा है। फिर भी? आप ये क्यों नहीं समझते कि दुल्हन ही दहेज है।”
 अब दंग होने की उनकी बारी थी पर वो समझाऊ मुद्रा में बोले, “ बहन जी, दुल्हन को दहेज समझाने वाली बातें सहेज कर रखी ही कहाँ गईं। जैसी आई थी, वैसी ही फुर्र हो गई। अच्छी बातें तो अच्छे तरीके से फुर्र होने के लिए ही आती हैं। ये उस चमकीले पर्दे की तरह होती है जिसके पीछे कबाड़ और कचरा भरा होता है। जिंदगी भर आपकी बेटी की खाने-पीने, पहननें- ओढ़ने और घर में रखने की जिम्मेदारी कोई फ्री- फंड में तो लेगा नहीं। कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी। जितनी बड़ी हैसियत, उतनी बड़ी कीमत...ठीक्क?”
 बिचौलिए ने दहेज की औचित्यता उचित तरीके से बता दी। मुझे बेटी की शादी तो करनी ही थी। कहा जाता है कि बेटी पराया धन होती है पर उससे पहले तो हमारा सारा धन ही पराया हो जाता है। वह समाज जिसे कभी अपने लिए खड़ा होते नहीं देखा, उसे मुँह भी तो दिखाना था। कल को सभी कहेंगे कि पैसे के कारण बेटी की शादी नहीं की। मैंने बिचौलिए से डिटेल लेनी शुरू कर दी, 
 “अच्छा बताओ लड़का करता क्या है?  कहाँ का अफसर है? किस ग्रेड का है?  सरकारी है या प्राइवेट? डाक्टर या पुलिस तो नहीं है?”
 फायदे के द्वार खुलते ही बिचौलिया उछल पड़ा। मेढक की तरह? नहीं, मेढक तो कम जगह में ही उछलता-कूदता रहता है। ज्यादा इधर-उधर नहीं जाता। बंदर की तरह भी नहीं कह सकते। बंदर तो थोड़ा समझदार और ईमानदार भी होता है। हाँ,  इतना कह सकते हैं कि बिचौलिया, बिचौलिये की ही तरह उछला और बोल पड़ा,  “बहन जी चिंता की चिता में मत बैठिए। वो डॉक्टर या पुलिस नहीं है। सरकारी अफसर तो बिल्कुल भी नहीं जहाँ घूमने के लिए घोड़ा-गाड़ी तो मिल जाएगी पर घुटने के लिए दबाव भी कम नहीं मिलते, जिन्दगी भर अपने घुटने पर हाथ धर के बैठे रहो , बस।”
  मैं आश्चर्य में डूब गई कि लड़के को पाँच करोड़ का दहेज किस बात का दूँ? कहीं वह  लेखक तो नहीं? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। उसके लिए पाँच करोड़ तो क्या पाँच रुपये भी न दूँ। कहीं वह एक्टर तो नहीं जिसकी जिंदगी और मौत का भरोसा ही न हो। ना बाबा ना। ऐसा तो नहीं कि वह  शोरूम या होटल-वोटल चलाता हो। नहीं-नहीं, बेटी पराया धन है पर देने के बाद छाया भी तो सदाबहार वाली चाहिए। कभी ईद तो कभी रोजा वाला सिस्टम बिल्कुल नहीं। 
 बिचौलिए ने शायद मेरा चेहरा पढ़ लिया था। उसने आराम से मुझे समझाया, “देखिये बहन जी, जिस लड़के को देखा है वह सैनिटाइजर बेचता है। पहले कम रेट पर खरीदकर ज्यादा रेट पर बेचता था। फिर अपनी दुकान खोल ली। बड़ा होनहार है। वह फैक्ट्री भी खोलने वाला है। लाइसेंस मिल गया है। अब वह शहर के दुकानों, नगर-निगम, ग्राम-पंचायतों और सरकारी दफ्तरों में भी सप्लाई करेगा। आस-पास के  एरिये को भी कवर करेगा। आगे जाकर जरूरत पड़े तो चीन और अमरीका जैसे बाहरी देशों में भी बेच सकता है।”
 मेरा मुँह खुला का खुला रह गया। आँखों में खुशी के आँसू कब आये, छलके और गालों पर निशान भी बना गये, पता ही नहीं चला। पूरी तरह आश्वस्त होकर मैने चैन की सांस ली। मेरी हालत देखकर बिचौलिये की आँखों में भी ‘मोटी नेग’ के आँसू आ गए।

मंगलवार, 11 अगस्त 2020

'आजादी तूँ और करीब आ जा'

आज राजस्थान पत्रिका मे पढ़े.


“मुझे आजादी चाहिए।”
“हमें तो उन्नीस सौ सैतालीस को ही अंग्रेजों से आज़ादी मिल गयी थी। फिर अब?”
“मुझे और आज़ादी चाहिए। आज़ादी मिलने के बाद कुछ नियम भी बना दिये गए, उसे संविधान कहा गया। मुझे इन नियमों से भी आज़ादी चाहिए, हाँ।”
 “जीवन में कुछ नियम तो होने ही चाहिए, तुम इतनी ज्यादा आज़ादी लेकर क्या करोगे?”
“मुझे खुले आम सड़क पर गाली देने का मन करता है। लड़कियों को देखकर उन्हें छेड़ने का जी चाहता है। डाक्टरों, नर्सों, पुलिस, भीड़ आदि पर पत्थर फेंकने की इच्छा करती है। अपनी गाड़ी को सड़क  के बीचों-बीच खड़ी करने को मन मचलता है। कोई टोके तो उसे ठोंकने को मैं हमेशा तैयार रहता हूँ। किसी को गोली से मारने का मन हो तो अपने मन को मार नहीं सकता। मन के हिसाब से देश के नियमों की किताब पलट देना चाहता हूँ। मन चंचल तो नियम भी चंचल, है न ?”
 “इसे आज़ादी थोड़े कहतें हैं। पूरी आबादी ऐसे ही करने लगे तो हो गया बंटाधार! मन को काबू में रक्ख।”
“काबू? मन है तो है, बस। मुझे तो राह चलते इधर-उधर थूकने का भी मन करता है। खासकर जहाँ ‘थूकना मना है’ का बोर्ड लगा हो। कई बार ‘मना’ शब्द पर ही मैं पान की पीक ’पुच्च’ से फेंक देता हूँ। कितना मज़ा आता है, क्या बताऊँ? इसी तरह ‘जहाँ मूतना मना है’ लिखा होता है, वहाँ खड़ा होकर अपना काम जरूर कर देता हूँ। कितनी मुश्किलों से तो आज़ादी मिली है, इतना भी न करें तो धिक्कार है आज़ादी पर।”
“तो जानवरों और इन्सानों की आज़ादी में क्या फर्क हुआ? वह चार पैरों से चलता है और तुम दो पैरों से, बस।”
“मुझे जानवर न कहो। अतिमनुष्य कहो। नीत्से ने कहा है जो मनुष्य के आगे की सोचे वह अतिमनुष्य है। यही विकासवाद का सिद्धान्त है - बंदर, मनुष्य और अतिमनुष्य। हमें विकास करना है। आज़ादी चाहिए...और आज़ादी... और, और आज़ादी...बिना नियम वाली पूरी आज़ादी, हाँ।”
“जिन कामों के लिए तुम्हें और आज़ादी चाहिए, वे काम तो कुछ लोग दशकों से कर रहें हैं। किताबी नियमों से क्या होता है?”
  वह शराबखाने चला गया। वहाँ से झूमते हुये निकला और सड़क पर जा रही एक युवती को घसीट कर अपनी गाड़ी में बिठा दिया। सड़क के बीचों-बीच पूरे स्पीड से उसने गाड़ी दौड़ायी। रास्ते में सुनसान जगह पर आधे घंटा रुका। युवती की कुछ चीखें निकलीं। अस्त-व्यस्त हालत में इसे बाहर फेंक कर वह युवक चल पड़ा। कुछ जगहों पर रोक कर अपने पास रखे पत्थर के टुकड़ों को डाक्टर, नर्स, पुलिस और भीड़ पर फेंका। आगे चलकर अपनी बंदूक निकालीं। गोलियों से दो-चार लोगों को भूना और घर जाकर पूरी तसल्ली के साथ गहरी नींद में सो गया। 
 अगली सुबह अचानक दहशत भरी तेज़ आवाज़ से उसकी नींद खुल गयी। सामने वाली दोनों खिड़कियों के शीशे टूट कर चकनाचूर हो गए थे। शोकेस में रखी क्रॉकरी फर्श पर टूटकर बिखरी हुयी थी। उसने धीरे से कदम आगे बढ़ाए पर पैर में टुकड़े चुभ ही गए। खून की धाराएँ बह निकलीं फिर भी लड़खड़ाते हुये उसने खिड़की से नीचे देखा। एक युवक सड़क के बीचों-बीच झूमते हुये चल रहा था। उसके हाथ में पत्थरों की थैली थी। वह चारों तरफ पत्थर फेंक रहा था। खिड़की से झाँकने वाला युवक थोड़ी देर शांत रहा फिर वह खूब तेजी से ’अरे,बहन...”  चिल्लाया। इसके बाद उसके सिर पर भी एक पत्थर का टुकड़ा उछल कर लग गया। दिमाग सन्नाटे में चला गया और वह धम्म से नीचे गिर पड़ा। शायद उसने मंदिर जाती अपनी बहन को चीखते हुये देख लिया था जिसे पत्थर वाला युवक घसीट कर एक कोने में ले जा रहा था