पुरुष सशक्तिकरण वाया फिल इन द ब्लैंक्स
‘‘गुड मार्निंग सर्रर।’’
“सब लोग शांत...हाँ-हाँ ठीक है। सिट डाउन हो जाओ...।’’
आदेश मिलते ही बच्चे धम्म से अपनी सीट पर बैठ गये। जो खाली बेंच पर किनारे बैठे, वे दूसरी तरफ से बेंच उठने से गिर गये। कुछ धकियाने की लत से भी इधर-उधर हो गए। हिंदी मीडियम विद्यालय के अंग्रेजी विषय की ‘किलास सेभेन’ में सर जी का प्रवेश होते ही यह दृश्य लगभग रोज रहता है। मास्साब बड़े धैर्य से ये सारी हरकतें देखतें रहतें हैं।
“हाँ तो कल्ल हम क्या पढ़ा रहे थे?’’ बच्चों को अपने हाल पर छोड़ने के थोड़ी देर बाद मास्साब पूछ बैठे।
“सर जी सब्जेक्ट-परेडीकेट...आज इस पाठ का फिल्ल इन द ब्लैंक्स करवाना है। सर जी, आपने कहा था सभी में परोनाऊन भरना है।’’ कक्षा के मानीटर ने उत्साह से जबाब दिया।
“ठीक है बुकवा लाओ।”
मानीटर ने अपनी किताब दे दी। दो-चार और भी लड़के अपनी किताबें लेकर आगे आये थे पर मानीटर ने डांटकर भगा दिया। लड़कियों में ज्यादा उत्साह नही दिखा। वे चुपचाप पीछे बैठी हुईं नये एडमिशन वाली एक लड़की किताब लेकर उठी भी तो लड़के हाथ दिखाकर हँसने लगे। किताब पकड़े सकुचाते हुए अपनी जगह वह बैठ गयी। मास्टर साब गौरवान्वित थे कि उनके ‘किलास’ की लडकियां सभ्य और सुसंस्कृत परिवार से ताल्लुक रखतीं हैं।
“चलो सभी लोग बुक खोल्लो...पेज नम्बर सेभेन्टी टू।’’
“जी क्या?’’
“गदहे सेभेन्टी टू...बहत्तर बहत्तर...।’’ इतना कहते हुए मास्टर साब ने उस बच्चे के दोनों कान जोर से उमेठे और “कितनी बार कहा है अंगरेजी का जमाना है इस शब्जेक्ट में मेहनत करा करो...बकलोल कहीं के” कहकर अपनी कुर्सी के पास आ गये।
“चल्लो...अब मैं फिल्ल इन द ब्लैंक्स वाले प्रश्न में भरने वाले शब्दों को बताऊंगा, तुमलोग अपनी कितबवा में नोट कर लेना, ठीक?’’ मास्टर साब ब्लैक-बोर्ड पर उत्तर बोलते हुए लिखने लगे, “देखो! पहला है खाली जगह यानि कि डैश-डैश फिर...इज वाकिंग ऑन द रोड। इसमें ‘ही’ भरौ।” इतना कहकर उन्होंने लड़कियों को एक बार देखा फिर लड़कों को।
लड़के खुश और उत्साहित थे। इन्हीं में से एक लड़का ‘कमलवा’ बड़ा जिद्दी था। किसी के फटे में टांग अड़ाना उसे अच्छी तरह पता था। लड़कियों की तरफ तिरछी मुस्कान देखकर इसने पूछा, “सर सड़कवा पर लड़की भी तो टहल सकती है...‘सी’ परोनाउन लगाये से गलत हो जावेगा का?”
“सिट डाउन हो जाओ...स्साले! सड़किया पर तो लड़का ही टहलेगा न कि लड़की? बैट्ठो...’ही’ लिक्खो चुपचाप।’’ मास्टर साब ने कमर पर हाथ धर चारों तरफ देखकर पूछा, “सारे बताओ उत्तर क्या होगा ‘ही’ कि ‘शी’?’’
“हीईईईई...।” लड़कों की एक साथ आवाज गूँजी। लड़कियाँ शांत थीं फिर भी...। उन्होंने चुपचाप कापी में ‘ही’ लिख दिया।
अध्यापक ने ‘राउंड’ लगाकर सभी की कापी देखी और ‘साबास’ कहकर आगे का काम करवाने लगे।
“हाँ, चलो मैं ब्लैक-बोर्ड पर बाकी फिल्ल इन द ब्लैंक्स लिख रहा हूँ, तुमलोग कापी पर उतार लेना...बीच में कोई चूं–चपड़ नहीं ठीक!! तुम लोग मेरे से ज्यादा नहीं जानते हो और न जान पाओगे।” मास्टर साब ने ‘कमलवा’ को तेजी से घूरा और चाक-डस्टर उठाकर ‘ब्लैक-बोर्ड’ की तरफ मुँह कर लिया।
‘’हाँ दूसरा है खाली जगह यानि कि डैश-डैश फिर...ड्रिंक्स टू ग्लास ऑफ़ मिल्क डेली। इसमें लिखो ‘ही’। इसके बाद है...वाज रीडिंग न्यूज़ पेपर इन द मार्निंग और...इज प्लेइंग क्रिकेट। सभी में ‘ही’ डाल दो खटाखट...ठीक?” इतना कहकर वो हाथ से चाक झाड़कर विजयी मुद्रा में बैठ गए और खिड़की से बाहर देखने लगे। खुला आसमान और खुली धूप उनकी आँखों में चुभ गयी। उन्होंने खिड़की बंद कर शौचालय की दीवार की तरफ वाली खिड़की खोल ली।
“सर जी सारे परोनावनों को उलट भी तो सकतें हैं?” कमलवा ने बड़े ताव से पूछा।
“मतलब?”
“ही की जगह शी?”
“अरे भेवकूफ, गदहे रह जाओगे। घर में गिलास भर के दूध तुम पी जाते हो या तुम्हारी बहिनिया?...हाँ बोल्यो...।”
“जी हम्म्म...।”
“ठीक, तनि ये भी बताओ कि अखबार में किरकेट की खबर जो देखते हो, उसमें मर्द खेलतें हैं या औरत...मरद न? चलो सिट डाउन करो।”
“पर सर, न्यूझ पेपर वाली लाइन में तो शी भी भरा जा सकता है...?”
‘चल बैठ्य स्स्साले...जाकर अपनी अम्मा से पूछना कि अमरीका में इस समय क्या चल रहा है तो वह बता पायेंगी? नहीं न?...मंदी क्यों छा जाती है, इसका जबाब भी नहीं दे पाएंगी वो...औरी सुनो! अखबार आते ही तुम्हारे पापा पढ़तें हैं, मम्मी नहीं...ज्यादा बहसिया न करो...बाकि भी सब ठीके-ठाक है, जाने? जो समाज में हो रहा है, वही लिखो बिटवा...अरस्तु ने कहा है न कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है...चल्लो, जो लिखवाया है वो ही याद करो अगर अगली कक्षा में जाना है तो...समझे?”
मास्टर साब के गुस्से से कक्षा में शांति छा गयी। कुछ देर बाद वो खड़े होकर कहने लगे, “चलो ‘शी’ वाला भी फिल्ल इन द ब्लैंक्स कर लो, तुमलोगों को शांति मिल जाएगी ठीईईक?”
मास्टर साब ने खटाक से पिछला लिखा मिटाया और अगला बोलकर लिखने लगे- “खाली जगह यानि डैश डैश...इज मेकिंग फ़ूड इन द किचन। दूसरा,...इज वीपिंग ऑन द रोड। दोनों में ‘शी’ भर दो झट से।...क्यों बे कमलवा अब खुश...?”
“सर्रर जी, इन सारे सेन्टेंसों में हम ‘शी’ की जगह ‘ही’ नहीं भर सकते?’’ कमलवा ने इस बार झिझकते हुए पूछा।
“अब्बे चुप्प! नाम काट कर घर भेज देंगें...समझे कि नहीं...हमारा टीचर बनेगा तू?”
सारे बच्चों ने काम पूरा करके कापी मास्टर साब को दे दी।
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इन्द्रजीत कौर
, मो.-7380739992