खाली थाली और उनका आभामंडल
-इन्द्रजीत कौर
ये सब उनके बाएं हाथ की सबसे छोटी उंगली का खेल है। चिपके पेट को भरा हुआ बता देतें है और भरे को खाली घोषित कर ख़ुशी से मदद भी कर देतें हैं। अपनी कमियों को छिपाने में वो कम नहीं हैं। हो भी क्यों न? सदियों से सिंहासन की पवित्र परंपरा जो ऐसी है।
मेरे मोहल्ले के रामू की थाली खाली पड़ी है पर महाशय को यह खाली कतई नहीं लगती। अतः वो दुखी भी नहीं होते। स्नेह से थाली पकड़कर वो सिर के पीछे लगा लेतें हैं। इससे उनका आभामंडल तैयार हो जाता है। थाली लगाते ही उनमें थल के साथ जल और वायु क्षेत्रों के मालिक होने का बोध घर कर जाता है। इस बोधत्व से उनके मुखमंडल में अंदरूनी चमक बढ़ जाती है और थाली के प्रकाश से किरणें टकराकर चहुँओर फ़ैल जाती है।
हालांकि कुछ का मानना है कि वो बहुत तेज हैं। खाली थाली लगाते ही उनके तीव्र तेजत्व से थाली में छेद हो जाता है। मैंने हिम्मत करके उनसे शंका का समाधान कर डाला, “आपको नहीं लगता कि जिस थाली में आप खा रहें हैं, उसमें छेद नहीं करना चाहिए?”
उनका मुख आग के गोले में बदल गया। तेज आवाज में उन्होंने लावा निकाला, ‘देखिये भैनजी, मैं उनका दिया नहीं खाता, वे मेरा दिया खातें हैं। मेरी वजह से उनके पूरे शरीर के अस्थिपंजर का अस्तित्व है। उन्हें हवा, पानी और धूप मेरी वजह से मिलती हैं। उनके खेत की मिट्टी की नमी भी मेरी ही दी हुई है।”
इतना सुनते ही बगल में खड़े रामू के आँखों में नमी आ गयी। मैं पूछने ही वाली थी कि ‘इसकी आखों की नमी देने का हक आपको किसने दिया?’ पर हड्डी का ढांचा सँभाले उस बन्दे ने मना कर दिया।
मैंने सोचा कि मुई थाली भी क्या करे? जैसे ही आभामंडल बनाने के लिए उठाया जाता है, उसकी चमक बढ़ती जाती है। इसके दो फायदे हो जातें हैं- पहला, महाशय के चेहरे से थाली भर जाती है। दूसरा, उनका हँसता-चमकता चेहरा देखकर रामू को भूख नहीं लगती या लगी हुई भूख मर जाती है।
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इन्द्रजीत कौर, ई –iii/९१५, सेक्टर – आई, अलीगंज, लखनऊ-२२६०२४ मो
शनिवार, 1 जनवरी 2022
खाली थाली और उनका आभामंडल
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