मंगलवार, 28 जून 2022

गन्ना, आप और पेरोई सत्र

गन्ना, आप और पेरोई सत्र

सुनिए! मैं गन्ना हूँ । वही जो खेत में मिट्टी के सहारे खड़ा था और आसमान की तरफ देखकर झूम रहा था । अचानक मुझे उखाड़ लिया गया। मैं संभल पाता या सामने वाले का कुछ उखाड़ पाता उससे पहले ही मुझे ट्रक में लादकर बाज़ार की ओर बड़ी उम्मीदों से ले जाया गया।
  मैंने सुन रखा था कि मिट्टी से अलग होना और बाज़ार में बिक जाना विकास की कोई सीढ़ी है। पूरा संसार इसी राह पर चलकर विकास कर रहा है। इससे स्तर ऊँचा हो जाता है । यह सोचकर मैं भी तरक्की की कल्पना में गोते लगाने लगा । मन उड़ान भरने लगा । 
 इतने में इस ट्रक वाले ने पहले से निर्धारित एक खरीददार को मुझे बेच दिया । उसने ऊपर से नीचे तक मुझे और मेरे ऊपर की मिट्टी बहुत ध्यान से देखा । उसका मन चंगा नहीं था फिर भी उसे कठौती में गंगा दिखाई दी । मुझे रगड़कर साफ किया और बची-खुची मिट्टी हटाई । 
 मैं मिट्टी रहित होते ही इतरा पड़ा और खुद को विकसित समझ लिया । मेरा चमकता पीला रंग ऐसा लग रहा था, जैसे बसंत आ गया हो । इस मालिक ने मुझे देखा , मुस्कराया और धीरे से सहलाया। बगल में पहले से रखे अन्य गन्नों के ऊपर रख दिया । वे भी मेरी तरह चमक रहे थे।  
 इतने में अचानक बहुत तेज धड़-धड़ की आवाज़ आयी। ऐसा लग रहा था कि एक साथ कई ट्रैक्टर चलना शुरू कर रहें हों। कुछ समझ पाता कि तीन-चार साथियों के साथ मुझे उठा लिया गया और  जूस की मशीन में बने चौकोर खाने में सटाक से डाल दिया गया । यहाँ ऊपर और नीचे असह्य दबाव वाले लोहे के हिस्सों ने मुझे विनम्रता से इस तरह कुचला जैसे ये सरकारी मशीनरी का कोई हिस्सा हों । मेरी धमनियों से ‘फ़चाक’ से रस निकल पड़ा। पहले जितना निकला, सो निकला फिर मुझे घूमा-फिरा निकाला गया। पूरी तरह रसविहीन कर दिया गया । मेरा शरीर कंकाल जैसा हो गया था। फिर भी उन्हें विश्वास नहीं हुआ न ही मुझ पर तरस आया। मुझे मोड़-माड़कर मशीन को थोड़ा ज्यादा दबाकर पूरी तरह निर्जीव कर दिया गया। 
 वो गन्ना जो पूरे होश और रसोस के साथ खेत में अपने पैरों के बल खड़ा होकर झूम रहा था और आसमान से बातें कर रहा था । उसे निःरस , सूखे और उजड़े तिनकों का रूप देकर कूड़ेदान में
फेंक दिया गया।
 साथियों, आपको मेरे पर तरस आ रहा होगा पर मुझे लगता है आपकी भी हालत लगभग मेरे जैसी ही है। विकास के नाम पर बेचा जाता है। आप फूल कर कुप्पा हो जातें हैं। बिक जाने पर जूस निकाल दिया जाता है। दिखने में आप फुले हुये जरूर लगतें हैं पर आप भी कंकाल के अलावा कुछ नहीं रहते? है न?
 घबराइये नहीं। कुछ मायनों में आपकी किस्मत मेरे से अच्छी है। मेरा पेरोई सत्र साल में एक बार ही आता है पर कुछ अपवादों को छोड़कर आपका पाँच साल में एक बार। मैं कंकाल के बाद गन्ना नहीं बन सकता। आप पुराने रूप में जा सकतें हैं। आप बिकने से पहले सोच-समझ सकतें हैं। बहुत कुछ उखाड़ सकतें हैं। यहाँ तक कि जूस की मशीन और खरीददार दोनों को बदल सकतें हैं।
पर मुझे समझ में नहीं आता कि इतने फायदे होने के बावजूद आप लोग गन्ने जैसी जिंदगी क्यों जीतें आ रहें हैं?

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें