गुरुवार, 8 सितंबर 2022

आज जन सन्देश टाइम्स में

आम के देश में आम

 जब तक सूरज चाँद रहेगा, आम के देश में आम रहेगा। इस पंक्ति में भले ही दो शब्द एक जैसे हों पर अर्थ अलग हैं  - एक फल तो दूसरा जन । हाँ, विशेषताएँ काफी मिलती-जुलती हैं । जैसे, फल की तरह जन भी कुछ डाल के होते हैं और कुछ पाल के।  कुछ हरे दिखते हैं तो कुछ पीले , कुछ कच्चे रहते हैं तो कुछ पक जाते हैं। कुछ निर्धारित समय सीमा में पक जाते हैं तो कुछ पकते-पकते रह जाते हैं , कुछ को कार्बाइड देकर पकाया जाता है। कहीं-कहीं तो सभी का मिला-जुला रूप भी पाया जाता है पर यह देश ,काल और परिस्थिति पर निर्भर करता है। 
 दोनों ‘आम’ में प्रजाति की दृष्टि से भी काफी समानताएं हैं।  जैसे , लंगड़ा आम की तरह कुछ लोग भी लंगड़े होते हैं। यह लंगड़ापन शारीरिक से ज्यादा मानसिक होता है ।  जन्मजात और दुनियाजात भी । इसे पूरे मन से चूसा जाता है और कई बार चुसवाया भी जाता है । कुछ लोग दशहरी की तरह होते हैं , जो ज्यादातर राजधानी और इसके आसपास ही पाए जाते हैं । इनका हर दिन दशहरा जैसा होता है । शायद तभी ये दशहरी हो पाते हैं। होना लाजिमी भी है वरना  वो राजधानी ही क्या जहाँ  लोग दशहरी ना हो और वो दशहरी ही क्या जो राजधानी या उसके आसपास न रहते हों ?  ‘सफेदा’ टाइप के लोग  कितने भी पीले क्यों न हों अपना  नाम सफेदा ही रखते हैं । इनका छिलका और गुदा दोनों पीले होते हैं । ज्यादातर ठेलों पर ये सिर के बल पाए जाते हैं। निश्चित समय में इनका प्रयोग न हो तो ये पिलपिले हो जाते हैं। फिर भी आम से भरे बाज़ार के शोर में ‘सफेदा’ नाम इन्हें अलग मुगालते में डालता है । जब कि ‘हिमसागर’ प्रजाति का आम थोड़ा अलग होता है। बहुत मीठा होता है, वजनदार भी।  पर बाहर से हरा ही रहता है। इस फल की तरह आम जन भी कम होते हैं।  
 वहीं सिंधूरी आम जैसे कुछ लोग मीठे नहीं होते। परन्तु रंग के कारण इन्हें मीठा मान लिया जाता है। इसकी बनावट तोतापारी आम से मिलती -जुलती है। चूँकि नाम में तोता लगा है। इसलिए यह आमों की भीड़ में एक रट्टामारी आम ही है। कोई क्रांतिकारी टेस्ट इसमें नहीं होता। 
 इतनी प्रजातियों के बावजूद ज्यादातर लोग चौसा आम की तरह होते हैं । ये अच्छी और पूरी तरह चूसे जाते हैं । एकाग्रचित्तता के साथ। एक रेशा भी नहीं छूट पाता। अतः इसे सिर्फ आम भी कह दो तो कोई फर्क नहीं पड़ता। ज़रा किसी को चूसते हुए देखो तो जरा, चूसक आंखे फाड़कर अपने हाथों से गुठली के दोनों छोरों को पकड़ते हुए निर्दयता से चूसता है। ऐसा लगता है कि  राजा और प्रजा के रिश्तों को निभा रहा हो। कई चूसक तो इसे चूसने के बाद कड़ी धूप में सुखा देते हैं । अपने हिसाब से इस पर आकृति बनाकर रंग भर देते हैं । इसे तो कठपुतली बनाकर खेलते हुये भी देखा गया है।  खिलाड़ियों को बड़ा मज़ा आता है इस खेल में । शेक्सपियर का कथन यहाँ पूरी तरह झूठा हो जाता है कि ‘नाम में क्या रखा है?’ बल्कि अपना देसी मुहावरा ‘जैसा नाम, वैसा काम’ ही यहाँ ज्यादा सूट करता है।  
 एक महँगी प्रजाति ‘अल्फांसो’ नाम की भी पायी जाती है । फ़िल्म और औद्योगिक शहरों जैसे महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात आदि में पैदा होते हैं। ‘अल्फ़ान्सो’ नाम पुर्तगाल के मशहूर सैन्य रणनीतिकार ‘अफोन्सो दि अल्बूकर्क’ के नाम पर पड़ा है। अंग्रेजों की ये खास पसंद थे ।  इन्हें अन्य आमों पर राज़ करने की आदत हैं। इसीलिए जिनका विदेशी लिंक हो या जिन्हें राज-पाट में रुचि हो वे ही इन्हें खा पाते हैं।  इनकी खुशबू, भाव, रंग-रूप और उपलब्धता विशेष होती है। दशहरी, चौसा, देसी वगैरह इनके आगे पानी भरते हैं । इसके नाम में आम लगाना प्रजाति के साथ नाइंसाफी है  ।
 हालाँकि आमों की लगभग पंद्रह सौ प्रजातियाँ हैं पर सभी का जिक्र संभव नहीं है। इनका मानवीकरण करना हो तो कुछ प्रजातियाँ ही काफी हैं । जैसे फलां अपने आप को बड़ा अल्फ़ान्सो समझता था पर निकला निरा चौसा, चुनाव में इतनी मेहनत के बावजूद मंत्रालय में जगह नहीं मिल पाई । हो भी क्यों न ? ‘अल्फ़ान्सो’ व्यक्ति से नहीं पारिवारिक इतिहास से बनता है। उधर, राम सिंह को देखो , बैठे-ठाले मंत्री बन गया , आखिर उसके पूर्वजों ने ही मिलकर तो पार्टी बनाई थी। अब  नीरज जो जौनपुर में रहता है ।  लखनऊ आता-जाता रहता है पर दशहरी थोड़े बन जाएगा । लंगड़ा तो लंगड़ा ही रहेगा न। अनिल तो दिखने में ही सिंधुरी है पर मिठास कुछ खास नहीं । जबकि उसी का छोटा भाई पूरा हिमसागर है। बड़ा मीठा बोलता है, बातें भी वज़नदार करता है।  वो उदासी में नहीं जीता , हरा भरा बना रहता है। 
 इन उदाहरणों को परे करते हुये कितना ही अच्छा होता कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अल्फांसो, दशहरी, लंगड़ा जैसे लोगों की कीमत, मिठास और उपलब्धता का विकेंद्रीकरण हो पाता । खास के देश में आम होने के बजाय आम के ही देश में आम होता । 
- इंद्रजीत कौर,

शनिवार, 3 सितंबर 2022

पुरुष सशक्तिकरण वाया फिल इन द ब्लैन्कस


   पुरुष सशक्तिकरण वाया फिल इन द ब्लैंक्स

 ‘‘गुड मार्निंग सर्रर।’’
“सब लोग शांत...हाँ-हाँ ठीक है। सिट डाउन हो जाओ...।’’
 आदेश मिलते ही बच्चे धम्म से अपनी सीट पर बैठ गये। जो खाली बेंच पर किनारे बैठे, वे दूसरी तरफ से बेंच उठने से गिर गये। कुछ धकियाने की लत से भी इधर-उधर हो गए। हिंदी मीडियम विद्यालय के अंग्रेजी विषय की ‘किलास सेभेन’ में सर जी का प्रवेश होते ही यह दृश्य लगभग रोज रहता है। मास्साब बड़े धैर्य से ये सारी हरकतें देखतें रहतें हैं। 
“हाँ तो कल्ल हम क्या पढ़ा रहे थे?’’ बच्चों को अपने हाल पर छोड़ने के थोड़ी देर बाद मास्साब पूछ बैठे।  
“सर जी सब्जेक्ट-परेडीकेट...आज इस पाठ का फिल्ल इन द ब्लैंक्स करवाना है। सर जी, आपने कहा था सभी में परोनाऊन भरना है।’’ कक्षा के मानीटर ने उत्साह से जबाब दिया।
“ठीक है बुकवा लाओ।”
 मानीटर ने अपनी किताब दे दी। दो-चार और भी लड़के अपनी किताबें लेकर आगे आये थे पर मानीटर ने डांटकर भगा दिया। लड़कियों में ज्यादा उत्साह नही दिखा। वे चुपचाप पीछे बैठी हुईं नये एडमिशन वाली एक लड़की किताब लेकर उठी भी तो लड़के हाथ दिखाकर हँसने लगे। किताब पकड़े सकुचाते हुए अपनी जगह वह बैठ गयी। मास्टर साब गौरवान्वित थे कि उनके ‘किलास’ की लडकियां सभ्य और सुसंस्कृत परिवार से ताल्लुक रखतीं हैं। 
“चलो सभी लोग बुक खोल्लो...पेज नम्बर सेभेन्टी टू।’’
“जी क्या?’’
“गदहे सेभेन्टी टू...बहत्तर बहत्तर...।’’ इतना कहते हुए मास्टर साब ने उस बच्चे के दोनों कान जोर से उमेठे और “कितनी बार कहा है अंगरेजी का जमाना है इस शब्जेक्ट में मेहनत करा करो...बकलोल कहीं के” कहकर अपनी कुर्सी के पास आ गये।
“चल्लो...अब मैं फिल्ल इन द ब्लैंक्स वाले प्रश्न में भरने वाले शब्दों को बताऊंगा, तुमलोग अपनी कितबवा में नोट कर लेना, ठीक?’’ मास्टर साब ब्लैक-बोर्ड पर उत्तर बोलते हुए लिखने लगे, “देखो! पहला है खाली जगह यानि कि डैश-डैश फिर...इज वाकिंग ऑन द रोड। इसमें ‘ही’ भरौ।” इतना कहकर उन्होंने लड़कियों को एक बार देखा फिर लड़कों को।
 लड़के खुश और उत्साहित थे। इन्हीं में से एक लड़का ‘कमलवा’ बड़ा जिद्दी था। किसी के फटे में टांग अड़ाना उसे अच्छी तरह पता था। लड़कियों की तरफ तिरछी मुस्कान देखकर इसने पूछा, “सर सड़कवा पर लड़की भी तो टहल सकती है...‘सी’ परोनाउन लगाये से गलत हो जावेगा का?”
“सिट डाउन हो जाओ...स्साले! सड़किया पर तो लड़का ही टहलेगा न कि लड़की? बैट्ठो...’ही’ लिक्खो चुपचाप।’’ मास्टर साब ने कमर पर हाथ धर चारों तरफ देखकर पूछा, “सारे बताओ उत्तर क्या होगा ‘ही’ कि ‘शी’?’’ 
“हीईईईई...।” लड़कों की एक साथ आवाज गूँजी। लड़कियाँ शांत थीं फिर भी...। उन्होंने चुपचाप कापी में ‘ही’ लिख दिया।
 अध्यापक ने ‘राउंड’ लगाकर सभी की कापी देखी और ‘साबास’ कहकर आगे का काम करवाने लगे।
“हाँ, चलो मैं ब्लैक-बोर्ड पर बाकी फिल्ल इन द ब्लैंक्स लिख रहा हूँ, तुमलोग कापी पर उतार लेना...बीच में कोई चूं–चपड़ नहीं ठीक!! तुम लोग मेरे से ज्यादा नहीं जानते हो और न जान पाओगे।”  मास्टर साब ने ‘कमलवा’ को तेजी से घूरा और चाक-डस्टर उठाकर ‘ब्लैक-बोर्ड’ की तरफ मुँह कर लिया।
‘’हाँ दूसरा है खाली जगह यानि कि डैश-डैश फिर...ड्रिंक्स टू ग्लास ऑफ़ मिल्क डेली। इसमें लिखो ‘ही’। इसके बाद है...वाज रीडिंग न्यूज़ पेपर इन द मार्निंग और...इज प्लेइंग क्रिकेट। सभी में ‘ही’ डाल दो खटाखट...ठीक?” इतना कहकर वो हाथ से चाक झाड़कर विजयी मुद्रा में बैठ गए और खिड़की से बाहर देखने लगे। खुला आसमान और खुली धूप उनकी आँखों में चुभ गयी। उन्होंने खिड़की बंद कर शौचालय की दीवार की तरफ वाली खिड़की खोल ली। 
“सर जी सारे परोनावनों को उलट भी तो सकतें हैं?” कमलवा ने बड़े ताव से पूछा।
“मतलब?” 
“ही की जगह शी?”
“अरे भेवकूफ, गदहे रह जाओगे। घर में गिलास भर के दूध तुम पी जाते हो या तुम्हारी बहिनिया?...हाँ बोल्यो...।”
“जी हम्म्म...।”
“ठीक, तनि ये भी बताओ कि अखबार में किरकेट की खबर जो देखते हो, उसमें मर्द खेलतें हैं या औरत...मरद न? चलो सिट डाउन करो।”
“पर सर, न्यूझ पेपर वाली लाइन में तो शी भी भरा जा सकता है...?”
‘चल बैठ्य स्स्साले...जाकर अपनी अम्मा से पूछना कि अमरीका में इस समय क्या चल रहा है तो वह बता पायेंगी? नहीं न?...मंदी क्यों छा जाती है, इसका जबाब भी नहीं दे पाएंगी वो...औरी सुनो! अखबार आते ही तुम्हारे पापा पढ़तें हैं, मम्मी नहीं...ज्यादा बहसिया न करो...बाकि भी सब ठीके-ठाक है, जाने? जो समाज में हो रहा है, वही लिखो बिटवा...अरस्तु ने कहा है न कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है...चल्लो, जो लिखवाया है वो ही याद करो अगर अगली कक्षा में जाना है तो...समझे?”
 मास्टर साब के गुस्से से कक्षा में शांति छा गयी। कुछ देर बाद वो खड़े होकर कहने लगे, “चलो ‘शी’ वाला भी फिल्ल इन द ब्लैंक्स कर लो, तुमलोगों को शांति मिल जाएगी ठीईईक?” 
 मास्टर साब ने खटाक से पिछला लिखा मिटाया और अगला बोलकर लिखने लगे- “खाली जगह यानि डैश डैश...इज मेकिंग फ़ूड इन द किचन। दूसरा,...इज वीपिंग ऑन द रोड। दोनों में ‘शी’ भर दो झट से।...क्यों बे कमलवा अब खुश...?” 
“सर्रर जी, इन सारे सेन्टेंसों में हम ‘शी’ की जगह ‘ही’ नहीं भर सकते?’’ कमलवा ने इस बार झिझकते हुए पूछा।
“अब्बे चुप्प! नाम काट कर घर भेज देंगें...समझे कि नहीं...हमारा टीचर बनेगा तू?”  
 सारे बच्चों ने काम पूरा करके कापी मास्टर साब को दे दी। 
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इन्द्रजीत कौर

, मो.-7380739992 




मंगलवार, 28 जून 2022

गन्ना, आप और पेरोई सत्र

गन्ना, आप और पेरोई सत्र

सुनिए! मैं गन्ना हूँ । वही जो खेत में मिट्टी के सहारे खड़ा था और आसमान की तरफ देखकर झूम रहा था । अचानक मुझे उखाड़ लिया गया। मैं संभल पाता या सामने वाले का कुछ उखाड़ पाता उससे पहले ही मुझे ट्रक में लादकर बाज़ार की ओर बड़ी उम्मीदों से ले जाया गया।
  मैंने सुन रखा था कि मिट्टी से अलग होना और बाज़ार में बिक जाना विकास की कोई सीढ़ी है। पूरा संसार इसी राह पर चलकर विकास कर रहा है। इससे स्तर ऊँचा हो जाता है । यह सोचकर मैं भी तरक्की की कल्पना में गोते लगाने लगा । मन उड़ान भरने लगा । 
 इतने में इस ट्रक वाले ने पहले से निर्धारित एक खरीददार को मुझे बेच दिया । उसने ऊपर से नीचे तक मुझे और मेरे ऊपर की मिट्टी बहुत ध्यान से देखा । उसका मन चंगा नहीं था फिर भी उसे कठौती में गंगा दिखाई दी । मुझे रगड़कर साफ किया और बची-खुची मिट्टी हटाई । 
 मैं मिट्टी रहित होते ही इतरा पड़ा और खुद को विकसित समझ लिया । मेरा चमकता पीला रंग ऐसा लग रहा था, जैसे बसंत आ गया हो । इस मालिक ने मुझे देखा , मुस्कराया और धीरे से सहलाया। बगल में पहले से रखे अन्य गन्नों के ऊपर रख दिया । वे भी मेरी तरह चमक रहे थे।  
 इतने में अचानक बहुत तेज धड़-धड़ की आवाज़ आयी। ऐसा लग रहा था कि एक साथ कई ट्रैक्टर चलना शुरू कर रहें हों। कुछ समझ पाता कि तीन-चार साथियों के साथ मुझे उठा लिया गया और  जूस की मशीन में बने चौकोर खाने में सटाक से डाल दिया गया । यहाँ ऊपर और नीचे असह्य दबाव वाले लोहे के हिस्सों ने मुझे विनम्रता से इस तरह कुचला जैसे ये सरकारी मशीनरी का कोई हिस्सा हों । मेरी धमनियों से ‘फ़चाक’ से रस निकल पड़ा। पहले जितना निकला, सो निकला फिर मुझे घूमा-फिरा निकाला गया। पूरी तरह रसविहीन कर दिया गया । मेरा शरीर कंकाल जैसा हो गया था। फिर भी उन्हें विश्वास नहीं हुआ न ही मुझ पर तरस आया। मुझे मोड़-माड़कर मशीन को थोड़ा ज्यादा दबाकर पूरी तरह निर्जीव कर दिया गया। 
 वो गन्ना जो पूरे होश और रसोस के साथ खेत में अपने पैरों के बल खड़ा होकर झूम रहा था और आसमान से बातें कर रहा था । उसे निःरस , सूखे और उजड़े तिनकों का रूप देकर कूड़ेदान में
फेंक दिया गया।
 साथियों, आपको मेरे पर तरस आ रहा होगा पर मुझे लगता है आपकी भी हालत लगभग मेरे जैसी ही है। विकास के नाम पर बेचा जाता है। आप फूल कर कुप्पा हो जातें हैं। बिक जाने पर जूस निकाल दिया जाता है। दिखने में आप फुले हुये जरूर लगतें हैं पर आप भी कंकाल के अलावा कुछ नहीं रहते? है न?
 घबराइये नहीं। कुछ मायनों में आपकी किस्मत मेरे से अच्छी है। मेरा पेरोई सत्र साल में एक बार ही आता है पर कुछ अपवादों को छोड़कर आपका पाँच साल में एक बार। मैं कंकाल के बाद गन्ना नहीं बन सकता। आप पुराने रूप में जा सकतें हैं। आप बिकने से पहले सोच-समझ सकतें हैं। बहुत कुछ उखाड़ सकतें हैं। यहाँ तक कि जूस की मशीन और खरीददार दोनों को बदल सकतें हैं।
पर मुझे समझ में नहीं आता कि इतने फायदे होने के बावजूद आप लोग गन्ने जैसी जिंदगी क्यों जीतें आ रहें हैं?

शनिवार, 1 जनवरी 2022

खाली थाली और उनका आभामंडल

खाली थाली और उनका आभामंडल
-इन्द्रजीत कौर
ये सब उनके बाएं हाथ की सबसे छोटी उंगली का खेल है। चिपके पेट को भरा हुआ बता देतें है और   भरे को खाली घोषित कर ख़ुशी से मदद भी कर देतें हैं। अपनी कमियों को छिपाने में वो कम नहीं हैं। हो भी क्यों न? सदियों से सिंहासन की पवित्र परंपरा जो ऐसी है।
मेरे मोहल्ले के रामू की थाली खाली पड़ी है पर महाशय को यह खाली कतई नहीं लगती। अतः वो दुखी भी नहीं होते। स्नेह से थाली पकड़कर वो सिर के पीछे लगा लेतें हैं। इससे उनका आभामंडल तैयार हो जाता है। थाली लगाते ही उनमें थल के साथ जल और वायु क्षेत्रों के मालिक होने का बोध घर कर जाता है। इस बोधत्व से उनके मुखमंडल में अंदरूनी चमक बढ़ जाती है और थाली के प्रकाश से किरणें टकराकर चहुँओर फ़ैल जाती है।
हालांकि कुछ का मानना है कि वो बहुत तेज हैं। खाली थाली लगाते ही उनके तीव्र तेजत्व से थाली में छेद हो जाता है। मैंने हिम्मत करके उनसे शंका का समाधान कर डाला, “आपको नहीं लगता कि जिस थाली में आप खा रहें हैं, उसमें छेद नहीं करना चाहिए?”
उनका मुख आग के गोले में बदल गया। तेज आवाज में उन्होंने लावा निकाला, ‘देखिये भैनजी, मैं उनका दिया नहीं खाता, वे मेरा दिया खातें हैं। मेरी वजह से उनके पूरे शरीर के अस्थिपंजर का अस्तित्व है। उन्हें हवा, पानी और धूप मेरी वजह से मिलती हैं। उनके खेत की मिट्टी की नमी भी मेरी ही दी हुई है।”
इतना सुनते ही बगल में खड़े रामू के आँखों में नमी आ गयी। मैं पूछने ही वाली थी कि ‘इसकी आखों की नमी देने का हक आपको किसने दिया?’ पर हड्डी का ढांचा सँभाले उस बन्दे ने मना कर दिया।
मैंने सोचा कि मुई थाली भी क्या करे? जैसे ही आभामंडल बनाने के लिए उठाया जाता है, उसकी चमक बढ़ती जाती है। इसके दो फायदे हो जातें हैं- पहला, महाशय के चेहरे से थाली भर जाती है। दूसरा, उनका हँसता-चमकता चेहरा देखकर रामू को भूख नहीं लगती या लगी हुई भूख मर जाती है।
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इन्द्रजीत कौर, ई –iii/९१५, सेक्टर – आई, अलीगंज, लखनऊ-२२६०२४   मो

सोमवार, 7 दिसंबर 2020

आओ dhokha-dhokha खेलें

आज जनसंदेश टाइम्स में

आओ धोखा-धोखा खेलें
-इंद्रजीत कौर 
 हालाँकि सदियों से धोखा देने का कार्य गलत माना जाता रहा है। धर्मग्रंथ, वेद-पुराण और प्रवचनों में भी विश्वासघात की बुराई की गयी है। यहाँ तक कि ‘धोखा’ शब्द खुद भी हमे आगाह करता है कि ‘धो’ और ‘खा’। इसके बावजूद वास्तविक दुनियाँ में ‘धोखा’ एक पवित्र और संस्कारी कार्य हो गया है। अधिकांश महत्वपूर्ण लक्ष्यों का यह शुभ-मंत्र बना हुआ है। कुछ लोगों के सधे हुये काम इससे भले बिगड़ जाते हों पर ज़्यादातर लोगों के बिगड़े काम इसी से ही सधते हैं।  इसे कई बातों से सिद्ध किया जा सकता है। 
  पहला, इसमें परोपकार कूट-पीस कर भरा होता है। प्रक्रिया यह है कि इस भावना को पहले कूट कर अधमरा किया जाता है। इसके बाद इसे पीस कर पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि और वायु के हवाले कर दिया जाता है। जो बची-खुची अपरोपकारी भावनायेँ रह जाती हैं उसी पर बैठकर धोखा दिया जाता है। इससे रास्ता साफ हो जाता है। कोई अड़चन नहीं आती।
 दूसरा यह कि धोखा देने से ध्वनि प्रदूषण भी नहीं फैलता। पहले से शोर मचाकर मज़ा खराब हो जाता है अतः यह झटके से दिया जाता है। इसकी ‘प्लानिंग’ झटके में नहीं होती। समय लगता है। श्रम करना पड़ता है। पसीना बहाना पड़ता है। गंदे नाले के ऊपर करीने से गुलाब की पंखुड़ियाँ बिछाई जाती हैं। इत्र छिड़का जाता है। धोखापावक को प्यार से बुला लिया जाता है फिर  अचानक छपाक...। हालाँकि कुछ लोगों को इस रहस्य का पता रहता है पर वे रहस्यमयी आत्मा की तरह अदृश्य और मूक बने रहतें हैं। वातावरण को ध्वनि प्रदूषण से मुक्त बनाए रहतें है। 
 ऐसे झटकों की तीव्रता रिएक्टर स्केल से नहीं मापनी चाहिए। मशीन खराब हो सकती है। भूकंप के भयानक झटकों से भी ऊपर इसकी जगह होती है। फर्क यह है कि इसके कारक भौगोलिक न होकर मनोवैज्ञानिक होते हैं। ये धरती रूपी शरीर के अंदर ही रहतें हैं जहाँ स्थिति धीरे-धीरे बनती है। आस-पास पता नहीं चलता और अचानक विस्फोट हो जाता है। 
 तीसरा और सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि धोखादेवक का अहं शांत होता है, भले वह रंक जैसा भी न हो पर राजा जैसा विजयी महसूस करता है। उसकी और उसकी मंडली की खुशी से राष्ट्रीय खुशी का सूचकांक ऊपर चढ़ जाता है। इससे प्रति व्यक्ति खुशी में भी वृद्धि हो जाती है। 
 ऐसा महापुरुष जिधर मर्जी उधर अपनी प्लास्टिक मुस्कान और रावणीय अट्टहास के साथ झुक जाता है। इसे बिन पेंदी का लोटा भी नहीं कहा जा सकता। लोटे में कमी यह रहती है कि अंदर चुल्लू भर पानी संभालने की क्षमता रख सकता है पर धोखादेवक बिना पेंदी के साथ छेदधारक भी होता है। एक बूंद पानी भी इसमें नहीं टिक पाता। बेपानी और रूखा-सूखा होकर अपनी कूटनीति बनाता है। व्यक्तिगत खुन्नस को सामूहिक बताकर अपने घेरे को बड़ा कर लेता है। फिर होती है धौखिक आक्रमण की तैयारी। इसमें साथ वाले भी कम नहीं होते। मिट्टी के गुड्डे-गुड़ियों की तरह उनके कंधे और चेहरे के बीच स्प्रिंग लगे रहतें हैं जो हर गलत-सही बात पर हँसते हुये सिर्फ ‘हाँ’ करते हैं। महापुरुष मुसकुराता है पर मन ही मन दहाड़े मारकर हँसता भी है। वो कितना भी छोटा हों, सुकून उन्हें आसमां से भी बड़ा मिल जाता है। 
 दूसरी तरफ धोखा पाना भी सौभाग्य की बात होती है। हाँ, शुरू में थोड़ा-बहुत ब्लड-प्रेशर, हार्टअटैक या डिप्रेशन जैसी समस्या रहती है (अब गुदगुदी तो होगी नहीं, हाँ, रिश्तों की लुग्दी जरूर बन जाती है।) पर आँखों के आगे धुंध छंट जाती है। स्वच्छता अभियान को बल मिल जाता है। कौन चुल्लू भर पानी में है और कौन सर-आँखों तक लबालब है, पता चल जाता है। भावनाओं के अर्श के बाद धोखापावक फर्श पर जरूर आ गिरता है, चोट-वोट भी लग जाती है पर बेज़मीर वालों से हटकर बाज़मीर और ज़मीन वालों से जुड़ जाता है। आँखें इतनी ज्यादा खुल जातीं हैं कि शीशे के आगे खड़ा होने पर आँखों के अंदरूनी भाग के अलावा कुछ दिखता ही नहीं।  जैसे - दूरदृष्टिदोष, नजदीक दृष्टिदोष, आँखों के पोरों से निकले स्नेह के आँसुओं के नमकीनी अवशेष, नज़रों के तीरों से प्राप्त दागों के नज़ारे, आँखों के जाले, आँखों में झोंकी गयी ‘शुगर कोटेड’ धूल आदि। ये सारी चीजें आगे के कदमों के लिए ‘अलार्म’ का कार्य करतें हैं। दूध का जला दूध की आइसक्रीम को भी फूँक-फूँक कर पीता है। ऐसी महान आँखखोलक गतिविधि के लिए धोखाखावक को धोखादेवकों का आभार प्रकट करना चाहिए। 
 
  इन्द्रजीत कौर

गुरुवार, 19 नवंबर 2020

महान पड़ोसी होनै का सुख

महान पड़ोसी का सुख
-इंद्रजीत कौर 
 हमारा पड़ोसी महान है। कारण यह कि वो खुद को ऐसा समझता है। बातों को घूमा-फिरा कर कहना उसकी खानदानी परंपरा है। काम भी सीधे तरीके से नहीं करता। घूमा-फिरकर निपटाने की कोशिश करता है। काम खुद भी भूल जाता है कि वह किस दिशा और दशा में था और अब किस देश में है। पीठ के आगे-पीछे लोग चाहे कुछ भी कहें पर वो अपनी पीठ खुद ही थपथपा लेता है। कंधा पार करके पूरा हाथ पीठ पर नहीं जा पाता तो घूमा-फिरा ही इसे सहला देता है। 
 इससे गर्व और गर्भ, दोनों की अनूभूति होती है। उसे लगता है कि उसके अंदर बहुत सारी प्रतिभाएं पल रहीं हैं जिसे बाहर आना ही चाहिए। अगर पैर से टकराकर कोई कंकड़ एक तरफ हो जाय तो उसके मुँह से बोल फूट पड़तें हैं कि उसने रास्ते से पहाड़ हटा दिया है। एक कप चाय भी बनाता है तो मुझे मानना पड़ता है कि उसने घर में नाश्ता, लंच और डिनर तैयार किया है। ऐसी बातों पर मुझे ‘हाँ’ में ‘हाँ’ करना ही पड़ता है क्योंकि वो ‘हाँ’ की मुद्रा में सिर हिलाते हुये बात करता है। हर बात की समाप्ति पर ‘हैं न?’ और ‘है कि नहीं’ भी पूछता है। 
 यही नहीं, रात होने पर मेरी दीवार पर ठुक–ठुक करता है। मैंने कई बार आगाह किया। धमकाया। कोई असर नहीं। सुराख हो चुकें हैं। दोनों तरफ से छेद हैं तो मोहल्ले में इसका आरोप मेरे ही मत्थे मढ़ देता है। अपनी गाड़ी और गार्ड भी मेरे घर की हद में खड़ी करता है। कीड़ा, बिच्छू, कनखजूरा आदि निकल आए तो मेरे घर के आगे धीरे से सरका देता है। हम कुचल देते है फिर भी वह बाज नहीं आता है। उसका दिमाग खुराफ़ातों के लिए तो उपजाऊ है पर अच्छे कामों के लिए निपट बंजर। 
 मेरे पूर्वजों समेत पूरा परिवार लगभग सत्तर सालों से उसकी महान परंपरा को झेलते आ रहें है। कहीं से भी नहीं लगता कि वह मेरे ही परदादा की संतानों में से है। क्या करूँ? मेरे और मेरे देश की हालत एक जैसी ही है। ऐसा पड़ोसी कब तक और कितनी पीढ़ियों तक झेलना पड़ेगा, कुछ पता नहीं।