सोमवार, 7 दिसंबर 2020

आओ dhokha-dhokha खेलें

आज जनसंदेश टाइम्स में

आओ धोखा-धोखा खेलें
-इंद्रजीत कौर 
 हालाँकि सदियों से धोखा देने का कार्य गलत माना जाता रहा है। धर्मग्रंथ, वेद-पुराण और प्रवचनों में भी विश्वासघात की बुराई की गयी है। यहाँ तक कि ‘धोखा’ शब्द खुद भी हमे आगाह करता है कि ‘धो’ और ‘खा’। इसके बावजूद वास्तविक दुनियाँ में ‘धोखा’ एक पवित्र और संस्कारी कार्य हो गया है। अधिकांश महत्वपूर्ण लक्ष्यों का यह शुभ-मंत्र बना हुआ है। कुछ लोगों के सधे हुये काम इससे भले बिगड़ जाते हों पर ज़्यादातर लोगों के बिगड़े काम इसी से ही सधते हैं।  इसे कई बातों से सिद्ध किया जा सकता है। 
  पहला, इसमें परोपकार कूट-पीस कर भरा होता है। प्रक्रिया यह है कि इस भावना को पहले कूट कर अधमरा किया जाता है। इसके बाद इसे पीस कर पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि और वायु के हवाले कर दिया जाता है। जो बची-खुची अपरोपकारी भावनायेँ रह जाती हैं उसी पर बैठकर धोखा दिया जाता है। इससे रास्ता साफ हो जाता है। कोई अड़चन नहीं आती।
 दूसरा यह कि धोखा देने से ध्वनि प्रदूषण भी नहीं फैलता। पहले से शोर मचाकर मज़ा खराब हो जाता है अतः यह झटके से दिया जाता है। इसकी ‘प्लानिंग’ झटके में नहीं होती। समय लगता है। श्रम करना पड़ता है। पसीना बहाना पड़ता है। गंदे नाले के ऊपर करीने से गुलाब की पंखुड़ियाँ बिछाई जाती हैं। इत्र छिड़का जाता है। धोखापावक को प्यार से बुला लिया जाता है फिर  अचानक छपाक...। हालाँकि कुछ लोगों को इस रहस्य का पता रहता है पर वे रहस्यमयी आत्मा की तरह अदृश्य और मूक बने रहतें हैं। वातावरण को ध्वनि प्रदूषण से मुक्त बनाए रहतें है। 
 ऐसे झटकों की तीव्रता रिएक्टर स्केल से नहीं मापनी चाहिए। मशीन खराब हो सकती है। भूकंप के भयानक झटकों से भी ऊपर इसकी जगह होती है। फर्क यह है कि इसके कारक भौगोलिक न होकर मनोवैज्ञानिक होते हैं। ये धरती रूपी शरीर के अंदर ही रहतें हैं जहाँ स्थिति धीरे-धीरे बनती है। आस-पास पता नहीं चलता और अचानक विस्फोट हो जाता है। 
 तीसरा और सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि धोखादेवक का अहं शांत होता है, भले वह रंक जैसा भी न हो पर राजा जैसा विजयी महसूस करता है। उसकी और उसकी मंडली की खुशी से राष्ट्रीय खुशी का सूचकांक ऊपर चढ़ जाता है। इससे प्रति व्यक्ति खुशी में भी वृद्धि हो जाती है। 
 ऐसा महापुरुष जिधर मर्जी उधर अपनी प्लास्टिक मुस्कान और रावणीय अट्टहास के साथ झुक जाता है। इसे बिन पेंदी का लोटा भी नहीं कहा जा सकता। लोटे में कमी यह रहती है कि अंदर चुल्लू भर पानी संभालने की क्षमता रख सकता है पर धोखादेवक बिना पेंदी के साथ छेदधारक भी होता है। एक बूंद पानी भी इसमें नहीं टिक पाता। बेपानी और रूखा-सूखा होकर अपनी कूटनीति बनाता है। व्यक्तिगत खुन्नस को सामूहिक बताकर अपने घेरे को बड़ा कर लेता है। फिर होती है धौखिक आक्रमण की तैयारी। इसमें साथ वाले भी कम नहीं होते। मिट्टी के गुड्डे-गुड़ियों की तरह उनके कंधे और चेहरे के बीच स्प्रिंग लगे रहतें हैं जो हर गलत-सही बात पर हँसते हुये सिर्फ ‘हाँ’ करते हैं। महापुरुष मुसकुराता है पर मन ही मन दहाड़े मारकर हँसता भी है। वो कितना भी छोटा हों, सुकून उन्हें आसमां से भी बड़ा मिल जाता है। 
 दूसरी तरफ धोखा पाना भी सौभाग्य की बात होती है। हाँ, शुरू में थोड़ा-बहुत ब्लड-प्रेशर, हार्टअटैक या डिप्रेशन जैसी समस्या रहती है (अब गुदगुदी तो होगी नहीं, हाँ, रिश्तों की लुग्दी जरूर बन जाती है।) पर आँखों के आगे धुंध छंट जाती है। स्वच्छता अभियान को बल मिल जाता है। कौन चुल्लू भर पानी में है और कौन सर-आँखों तक लबालब है, पता चल जाता है। भावनाओं के अर्श के बाद धोखापावक फर्श पर जरूर आ गिरता है, चोट-वोट भी लग जाती है पर बेज़मीर वालों से हटकर बाज़मीर और ज़मीन वालों से जुड़ जाता है। आँखें इतनी ज्यादा खुल जातीं हैं कि शीशे के आगे खड़ा होने पर आँखों के अंदरूनी भाग के अलावा कुछ दिखता ही नहीं।  जैसे - दूरदृष्टिदोष, नजदीक दृष्टिदोष, आँखों के पोरों से निकले स्नेह के आँसुओं के नमकीनी अवशेष, नज़रों के तीरों से प्राप्त दागों के नज़ारे, आँखों के जाले, आँखों में झोंकी गयी ‘शुगर कोटेड’ धूल आदि। ये सारी चीजें आगे के कदमों के लिए ‘अलार्म’ का कार्य करतें हैं। दूध का जला दूध की आइसक्रीम को भी फूँक-फूँक कर पीता है। ऐसी महान आँखखोलक गतिविधि के लिए धोखाखावक को धोखादेवकों का आभार प्रकट करना चाहिए। 
 
  इन्द्रजीत कौर

गुरुवार, 19 नवंबर 2020

महान पड़ोसी होनै का सुख

महान पड़ोसी का सुख
-इंद्रजीत कौर 
 हमारा पड़ोसी महान है। कारण यह कि वो खुद को ऐसा समझता है। बातों को घूमा-फिरा कर कहना उसकी खानदानी परंपरा है। काम भी सीधे तरीके से नहीं करता। घूमा-फिरकर निपटाने की कोशिश करता है। काम खुद भी भूल जाता है कि वह किस दिशा और दशा में था और अब किस देश में है। पीठ के आगे-पीछे लोग चाहे कुछ भी कहें पर वो अपनी पीठ खुद ही थपथपा लेता है। कंधा पार करके पूरा हाथ पीठ पर नहीं जा पाता तो घूमा-फिरा ही इसे सहला देता है। 
 इससे गर्व और गर्भ, दोनों की अनूभूति होती है। उसे लगता है कि उसके अंदर बहुत सारी प्रतिभाएं पल रहीं हैं जिसे बाहर आना ही चाहिए। अगर पैर से टकराकर कोई कंकड़ एक तरफ हो जाय तो उसके मुँह से बोल फूट पड़तें हैं कि उसने रास्ते से पहाड़ हटा दिया है। एक कप चाय भी बनाता है तो मुझे मानना पड़ता है कि उसने घर में नाश्ता, लंच और डिनर तैयार किया है। ऐसी बातों पर मुझे ‘हाँ’ में ‘हाँ’ करना ही पड़ता है क्योंकि वो ‘हाँ’ की मुद्रा में सिर हिलाते हुये बात करता है। हर बात की समाप्ति पर ‘हैं न?’ और ‘है कि नहीं’ भी पूछता है। 
 यही नहीं, रात होने पर मेरी दीवार पर ठुक–ठुक करता है। मैंने कई बार आगाह किया। धमकाया। कोई असर नहीं। सुराख हो चुकें हैं। दोनों तरफ से छेद हैं तो मोहल्ले में इसका आरोप मेरे ही मत्थे मढ़ देता है। अपनी गाड़ी और गार्ड भी मेरे घर की हद में खड़ी करता है। कीड़ा, बिच्छू, कनखजूरा आदि निकल आए तो मेरे घर के आगे धीरे से सरका देता है। हम कुचल देते है फिर भी वह बाज नहीं आता है। उसका दिमाग खुराफ़ातों के लिए तो उपजाऊ है पर अच्छे कामों के लिए निपट बंजर। 
 मेरे पूर्वजों समेत पूरा परिवार लगभग सत्तर सालों से उसकी महान परंपरा को झेलते आ रहें है। कहीं से भी नहीं लगता कि वह मेरे ही परदादा की संतानों में से है। क्या करूँ? मेरे और मेरे देश की हालत एक जैसी ही है। ऐसा पड़ोसी कब तक और कितनी पीढ़ियों तक झेलना पड़ेगा, कुछ पता नहीं। 

    
      

शनिवार, 10 अक्टूबर 2020

'किसान किस आन का'

आज जनवाणी में


किसान किस आन का ?
-इंद्रजीत कौर 
 जरा हमारे गाँव की तरफ ध्यान दे दो। लोन, सूखा, बाढ़ और मँहगाई हमें बर्बाद कर रही है। हमें आपकी नीतियों का विरोध करने के लिए दूध और सब्जियों को सड़क पर फेंकना पड़ रहा है। हो सकता है आपका लाडला इतिहासकार आज के बारे में यह लिख डाले- “बहुत पहले दूध की नदियाँ बहतीं थीं। बीच में सब ठप्प हो गया था। इक्कीसवीं सदी में अनोखी क्रांति आई। पुनः दूध की धाराएँ सड़क पर दिखने लगी। यही नहीं, सब्जियों के ढेर भी सड़क पर लगने शुरू हो गए थे। इतना उत्पादन हुआ इस काल में कि सब्जियाँ खेतों, मंडियों और लोगों के पेटों से भर-भराकर सड़क पर आ गईं थीं। यहाँ तक कि सड़कें भी कम पड़ गयीं थीं।” कोई संदेह नहीं कि कुछ लोग इसे स्वर्णिम युग भी कह दें। किसी को क्या पता कि इसके पीछे हमें अपनी आत्मा तक को मारना पड़ा है। सोचा कि आत्महत्या से तो पूरी जिंदगी चली जाती है, आत्मा-हत्या ही सही। आपका क्या है ? आप तो कह देंगें कि इस काल में किसानों की आत्महत्या में काफी ज्यादा कमी आई थी। रही बात आत्मा की, इसकी बात तो कभी इतिहास में होती ही नहीं। 
 साहिब! मेरे बच्चे ने पढ़ रखा है कि हर गाँव को सड़क से कभी जोड़ दिया गया था। पर महोदय, यह तो कहीं लिखा नहीं कि इस पर चल के गाँव शहर को जा रहा है लेकिन शहर गाँव में नहीं आ पा रहा है। मेरे ख्याल से सड़कें जाने का ही रास्ता बतातीं हैं, आने का नहीं। हमारी फसल शहर वालों का पेट भरने के लिए जाती तो हैं पर हम खाली हाथ ही रहतें हैं। वहाँ से हमारे लिए कोई सुविधा नहीं आती। यहाँ से ईंट, मिट्टी, पत्थर, लकड़ी शहर में पक्के मकान बनाने के लिए चली तो जाती है पर हमारा मकान कच्चा ही रह जाता है। बिल्कुल मिट्टी और फूस वाला। लेखकों को भले इसमें से लिखने के लिए माल मिल जाता हो पर हमारा जीवन तो मल मेँ ही रहता है। फिल्म वाले भी यहाँ की कहानी दिखा कर ईनाम-विनाम पा जाते हैं। करोड़ों रुपये कमा लेते हैं पर हममें मेँ से किसी एक का भी मकान बनाया हो तो बताओ।     
 सुना है कि हमारे लिए फिर से कई योजनायें बनाईं गईं हैं। ऐसी भी खबरें आईं हैं कि उन पर काम हुआ है। हर कार्यवाही के पूरे होने के कागज़ तो होगें ही। खैर, क्या फर्क पड़ता है? चलिए छोड़िये, कागज भी तो काग की तरह होतें हैं जो मुंडेर पर बैठकर काँव-काँव तो कर लेते हैं पर मेहमान के आने की गारंटी-वारंटी नहीं दे पातें। तेज आवाज़ की कांवाहट  से लगता है कि काम ज़ोरों से हो रहा है। बस, खुशफहमी दे रहें हैं मुए सत्तर सालों से। हाँ, इस भ्रम से मरते हुए को थोड़ी जिंदगी मिल जाती है। इसी ऑक्सीज़न के सहारे हम टिके हुये हैं। किसान का आन बस इतना ही तो है। है कि नहीं?  
 पता नहीं क्यों? विदेशी कम्पनी की कोल्ड ड्रिंक वाली बोतल तो हमारे गाँव में दिख जाती है पर अपने ही देश की योज़ना यहाँ क्यों नहीं पहुँच पाती? किसान के लिए बनी नीतियों का किस्सा सभी को पता है। गाँधी जी के अनुसार देश की आत्मा गाँवों में बसती है। आत्मा को मारकर ही आगे बढ़ने का समय है। यह काम ज़ोरों से चल रहा

रविवार, 13 सितंबर 2020

हिन्दी स्लीमिंग सेन्टर में

हिन्दी स्लीमिंग सेंटर में

आज मैं अपना मोटापा कम करने के चक्कर में स्लीमिंग सेंटर गयी, वहाँ पहले से मौजूद लोंगों को हाय किया। अचानक मेरी नज़र एक जगह जाकर ठिठक गयी। कुछ जाना पहचाना चेहरा लग रहा था। वो भी मुस्कुराते हुए मुझे देख रही थी। उसके हाव-भाव कुछ अपने-अपने से लगे। जब किसी ने आवाज दी कि ‘हिन्दी तुम कैसी हो?’ तो मेरा मुँह  खुला का खुला रह गया। हिन्दी? यहाँ? मुझसे रहा नहीं गया। मैं सबको धकियाते हुए उसके पास पहुँची। गले लगाने के लिए जैसे ही आगे बढ़ी, उसने रोक दिया। बोली- “तुम हाथ मिलाओ तो अच्छा लगेगा। हाँ, दूर से ‘हेलो’ भी कह सकती थी। गले मिलना तो बीती बात हो गयी है। कहो, कुछ कहना था क्या?” 
     ऐसा रूखा जबाब सुनकर मुझे धक्का लगा। वह काफी बदल चुकी थी। उसमें अपनेपन का भाव ढूंढे नहीं मिला। मैं भी अड़ी रही और प्रश्नों की झड़ी लगाती रही, “इतनी पतली? क्यों? कैसे?” उसने हाथ चमकाकर जबाब दिया, “देखो ,मैने गरिष्ठ भोजन छोड़ दिया है। लोग मुझे लोकप्रिय बनाने के फिराक में थे तो मैं क्या करती? मुझे पतला होना पड़ा। भारी भरकम पहचान से दूरी बनानी पड़ी।  हल्के-फुल्के अंदाज में जो सबको पसंद आ जाय, रहना पसंद करती हूँ। ज्यादा गरिष्ठता के घिरे होने के कारण कोर्इ मुझे समझ नहीं पाता था। सिर्फ पुस्तकालय तक सीमित थी। अब ऐसा नहीं है। मुक्त अर्थव्यवस्था ने इंडिया को बड़ा बाजार बना दिया है। मुझे हर जगह पहुँचना होता है। मोटापा लेकर कहाँ-कहाँ  घुमूँगी? ग्लोबली पहचान बढ़ानी है। स्लिम होना जरूरी हो गया है ।(भर्राये गले से)...और भी सुनो, जब से मैने स्लीमिंग सेंटर आना शुरू किया है मेरी लोकप्रियता बढ़ी है। फिल्म, राजनीति, इंटरनेट आदि सब जगह मेरी मांग बढ़ी है।
उसका जबाब सुनकर मैं गुस्से से उबली। पूरे बल के साथ बोल पड़ी, ‘काहे की लोकप्रियता? तुम्हारी मौलिकता हटती जा रही है। अपनी जड़ से कटती जा रही हो। होश  में आओ। तुम तो हमारी राजभाषा हो। पहले वाले रूप में ही तुम लोकप्रिय बनो, प्लीज़़़।’’ मेरी दहाड़ निवेदन में तब्दील हो चुकी थी पर उसके सिर पर जूँ तक नहीं रेंगी। इसके विपरीत उसने मेरे ही सिर पर जूँ डाल दी। मुझे समझाने की चेश्टा की, “आज के दौर में मेरा पहले वाला रूप मान्य नहीं होगा। सिर्फ ‘राष्ट्र’ शब्द आगे लगाने से क्या होता है? राष्ट्रीय पक्षी मोर आज अपनी जिन्दगी के लिये मोर-मोर कह रहा है। राष्ट्रीय गीत अब कुछ लोगों को साम्प्रयदायिक गीत लगने लगा है। राष्ट्रीय पंक्ति ‘सत्यमेव जयते’ के आगे सभी लोग ‘अ’ लगाने में जुटे हुये हैं। बापूजी भी आज के हालात देखें तो अपने आप को राष्ट्रपिता की जगह सिर्फ पिता ही कहलाना ज्यादा पसंद करेंगें।....अब तुम्हीं बताओ मेरे से इतनी उम्मीद क्यों? ऐसे दौर में मैं अपनी हड़प्पाकालीन जगह पर डटी रही तो मुझे ही दौरे पड़ने लगेंगे। फिर से पुस्तकालयों तक ही रहना पड़ेगा। अत: गरिष्ठ शब्दों से दूर ही नहीं, बहुत दूर हो गयी हूँ। भूल जाइये उस वक्त को, नर्इ हिन्दी अपनार्इये, आप भी मेरे साथ आइये। मुझे लोकप्रिय बनाइये।”
उसके इस आधुनिक उत्तर को सुनकर मैं राष्ट्र सा मुँह लेकर वापस आ गयी। हिन्दी अपनी मजबूरी में मजबूती ढूंढने के लिये स्लीमिंग  सेन्टर में थी।
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रविवार, 6 सितंबर 2020

आशीर्वाद को खोजत फिरै...


‘आशीर्वाद को खोजत फिरे’
-इंद्रजीत कौर  
भले ही ‘आशीर्वाद’ शब्द का किताबी अर्थ हिन्दी में ‘आशीष’ हो पर वास्तविक दुनियाँ में इसके कई अर्थ हैं जो किसी शब्दकोश में ढूँढे नहीं मिलेंगे। 
 जैसे एक ग्राहक द्वारा दुकानदार के आगे हाथ जोड़कर आशीर्वाद माँगने का मतलब है कि खरीदे गए सारे समान कम रेट पर या उधारी में मिल जाय। अगर वह बार-बार झुकता है तो इसका मतलब उधारी चुकता का बेवजह दबाव उस पर न डाला जाय। इसके विपरीत जब दुकानदार ग्राहक के सामने हाथ जोड़ता है तो वह उससे पिछला हिसाब माँग रहा होता है। हाथ जोड़ने के साथ दुकानदार अपना सिर भी नब्बे से पैतालीस अंश नीचे की तरफ धँसाने लगता है तो वह ग्राहक से पिछले कई वित्तीय वर्षों के हिसाब चाह रहा होता है। 
 जब एक कर्मचारी अपने अधिकारी से ‘आशीर्वाद’ माँगता है तो उसका अर्थ एकदम अलग हो जाता है। उसकी चाहत होती है कि बेवजह उसे छुट्टियाँ मिलतीं रहें और काम-काज से बचा रहे। उसका निठल्लापन फलता-फूलता रहे। ‘आशीर्वाद’ शब्द से अच्छा  यमक अलंकार का उदाहरण देखने को नहीं मिलता। यह अलग बात है कि हिन्दी व्याकरण में हम सभी ने बचपन से ही ‘सुवरन को खोजत फिरै, कवि, व्यभिचारी, चोर’ उदाहरण ही पढ़ा है और पचपन तक यही रटा है। इसमें ‘सुवरन’ का अर्थ क्रमशः कवि के लिए सुंदर शब्द, व्यभिचारी के लिए सुंदर रंग (स्त्री का) और चोर के लिए ‘स्वर्ण’ है। ‘आशीर्वाद’ शब्द की व्यापकता इतनी ज्यादा है कि अगर उपरोक्त उदाहरण में ‘सुवरन’ के स्थान पर ‘आशीर्वाद’ लिख दें तो यहाँ भी तीनों के अर्थ अलग और सटीक ही निकलेगे। 
 जैसे कवि श्रोताओं से आशीर्वाद माँगता है तो उसका अर्थ हो जाता है ढेर सारी तालियाँ। इसकी गड़गड़ाहट की गूँज उसे अमृत समान लगती हैं। यह गूँज कम होती है तो उसकी जेब नम नहीं हो पाती है। विश्व के इतिहास ने इस तरह के कवियों को गिरते तारों की तरह गायब होते देखा है। यदि कवि मंच से भी आशीर्वाद माँगता है तो वह कवि सम्मेलनों के ठेकेदारों से और ज्यादा मंच की माँग कर रहा होता है। ऐसी दशा में सभी मंचस्थों के हाथ उठ जाय तो उसकी बल्ले-बल्ले हो जाती है। अगर कवि संयोजक से भी दुआएं माँगता है तो वह अगली बार के आमंत्रण का दबाव उस पर डाल रहा होता है और अपने लिफाफे को भारी से भारीतर करवा रहा होता है। ऐसा न होने पर उसे अपनी जिंदगी भारी लगने लगती है।  
 वहीं व्यभिचारी के लिए ‘आशीर्वाद’ का अर्थ ‘खुली छूट’ होती है। वह कुछ भी कहे–करे, कोई रोके-टोके नहीं। स्त्रियाँ इसके सामने सर्वस्व अर्पण कर दे। ऐसा नहीं हो पाता तो व्यभिचारी के पास स्त्रियों से आशीर्वाद लेने के कई हथकंडे होते हैं। सुंदर स्त्री को देखते ही वे हाथ जोड़कर ‘देवी जी’ बोलेंगे नौर नब्बे डिग्री तक झुक जाएंगे। ‘नारी महिमा’, नारी सशक्तिकरण, नारी आत्मनिर्भरता आदि पर प्रवचन देते नहीं थकते भले ही उनके घर की स्त्रियाँ सात पर्दों के अंदर रहतीं हों। नारी मुक्तिकरण और स्वछंदता पर तो ये ज्यादा ही ज़ोर देते हैं। इन मुद्दों पर ऐसे वचनाते हैं जैसे ‘नारी’ विषय पर सारी प्रोफेसरी इन्होंने ही कर रखी हो। परिणामस्वरूप इन्हें खूब आशीर्वाद मिल जाता है।  
 चोर के लिए भी ‘आशीर्वाद’ का अर्थ थोड़ा अलग हट कर है। इससे पहले चोर का विस्तृत अर्थ जान लें तो बेहतर होगा। चोर सिर्फ वो नहीं होते जो ताले तोड़कर घर और दुकानों से कीमती समान चुरा ले जाय या राह चलते पर्स, चैन और गाडियाँ उड़ा ले जाय। इसका अर्थ इतना व्यापक है कि क्षितिज के इस पार भी है और उस पार भी...। घोटाला से घटतौली तक, टैक्सचोरी से टैक्स उड़ेनी तक, हिस्से वाले सभी किस्से तक, स्थानीय बैंक से विश्व बैंक तक के माल झपटने तक, स्पेस में स्पेस कब्जियाने तक आदि में चोरत्व के गुण विद्यमान है। इन्हें प्राप्त करने के लिए संबन्धित चोरों को संबन्धित आकाओं से आशीर्वाद मिलता रहता है और चोरी की पावन क्रिया दिन चौगुनी रात सोलह गुनी गति से दौड़ती रहती है। इस प्रकार मात्राओं पर ध्यान न दें तो यह भी कहा जा सकता है कि ‘आशीर्वाद को खोजत फिरे, कवि, व्यभिचारी, चोर।’ 
 ऐसी बात नहीं है कि आज की तिथि तक इस शब्द के जो अर्थ निकले हैं, वहीं रहेंगे।  भविष्य में इसके नए अर्थों की बाढ़ बहती रहेगी और हिन्दी भाषा समृद्ध होती रहेगी। बस यह काल, दिशा, दशा और ताकत पर निर्भर करेगी

 
      

रविवार, 16 अगस्त 2020

सेनेटाइजर बेचने वाला दुल्हा

आज दैनिक जागरण में


सेनीटाइजर बेचने वाला दूल्हा

           -इन्द्रजीत कौर

 जैसे ही मुझे बिचौलिये ने बताया कि दूल्हे की कीमत पाँच करोड़ है, मैं दंग रह गई। इतना कि दंगा करने को मन मचल उठा पर मन को नियंत्रित करना पड़ा। आँखें बंद करके पाँच बार गहरी सांसे ली और बोल पड़ी, 
 “पच्चीस साल तक बेटी को पाल-पोस कर बड़ा किया है। पढ़ाया-लिखाया भी है।  अपना पेट काटकर पैसा लगाया है। लड़के की तरह अपनी लड़की को नौ महीने कष्टों के साथ पेट में रखा है। फिर भी? आप ये क्यों नहीं समझते कि दुल्हन ही दहेज है।”
 अब दंग होने की उनकी बारी थी पर वो समझाऊ मुद्रा में बोले, “ बहन जी, दुल्हन को दहेज समझाने वाली बातें सहेज कर रखी ही कहाँ गईं। जैसी आई थी, वैसी ही फुर्र हो गई। अच्छी बातें तो अच्छे तरीके से फुर्र होने के लिए ही आती हैं। ये उस चमकीले पर्दे की तरह होती है जिसके पीछे कबाड़ और कचरा भरा होता है। जिंदगी भर आपकी बेटी की खाने-पीने, पहननें- ओढ़ने और घर में रखने की जिम्मेदारी कोई फ्री- फंड में तो लेगा नहीं। कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी। जितनी बड़ी हैसियत, उतनी बड़ी कीमत...ठीक्क?”
 बिचौलिए ने दहेज की औचित्यता उचित तरीके से बता दी। मुझे बेटी की शादी तो करनी ही थी। कहा जाता है कि बेटी पराया धन होती है पर उससे पहले तो हमारा सारा धन ही पराया हो जाता है। वह समाज जिसे कभी अपने लिए खड़ा होते नहीं देखा, उसे मुँह भी तो दिखाना था। कल को सभी कहेंगे कि पैसे के कारण बेटी की शादी नहीं की। मैंने बिचौलिए से डिटेल लेनी शुरू कर दी, 
 “अच्छा बताओ लड़का करता क्या है?  कहाँ का अफसर है? किस ग्रेड का है?  सरकारी है या प्राइवेट? डाक्टर या पुलिस तो नहीं है?”
 फायदे के द्वार खुलते ही बिचौलिया उछल पड़ा। मेढक की तरह? नहीं, मेढक तो कम जगह में ही उछलता-कूदता रहता है। ज्यादा इधर-उधर नहीं जाता। बंदर की तरह भी नहीं कह सकते। बंदर तो थोड़ा समझदार और ईमानदार भी होता है। हाँ,  इतना कह सकते हैं कि बिचौलिया, बिचौलिये की ही तरह उछला और बोल पड़ा,  “बहन जी चिंता की चिता में मत बैठिए। वो डॉक्टर या पुलिस नहीं है। सरकारी अफसर तो बिल्कुल भी नहीं जहाँ घूमने के लिए घोड़ा-गाड़ी तो मिल जाएगी पर घुटने के लिए दबाव भी कम नहीं मिलते, जिन्दगी भर अपने घुटने पर हाथ धर के बैठे रहो , बस।”
  मैं आश्चर्य में डूब गई कि लड़के को पाँच करोड़ का दहेज किस बात का दूँ? कहीं वह  लेखक तो नहीं? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। उसके लिए पाँच करोड़ तो क्या पाँच रुपये भी न दूँ। कहीं वह एक्टर तो नहीं जिसकी जिंदगी और मौत का भरोसा ही न हो। ना बाबा ना। ऐसा तो नहीं कि वह  शोरूम या होटल-वोटल चलाता हो। नहीं-नहीं, बेटी पराया धन है पर देने के बाद छाया भी तो सदाबहार वाली चाहिए। कभी ईद तो कभी रोजा वाला सिस्टम बिल्कुल नहीं। 
 बिचौलिए ने शायद मेरा चेहरा पढ़ लिया था। उसने आराम से मुझे समझाया, “देखिये बहन जी, जिस लड़के को देखा है वह सैनिटाइजर बेचता है। पहले कम रेट पर खरीदकर ज्यादा रेट पर बेचता था। फिर अपनी दुकान खोल ली। बड़ा होनहार है। वह फैक्ट्री भी खोलने वाला है। लाइसेंस मिल गया है। अब वह शहर के दुकानों, नगर-निगम, ग्राम-पंचायतों और सरकारी दफ्तरों में भी सप्लाई करेगा। आस-पास के  एरिये को भी कवर करेगा। आगे जाकर जरूरत पड़े तो चीन और अमरीका जैसे बाहरी देशों में भी बेच सकता है।”
 मेरा मुँह खुला का खुला रह गया। आँखों में खुशी के आँसू कब आये, छलके और गालों पर निशान भी बना गये, पता ही नहीं चला। पूरी तरह आश्वस्त होकर मैने चैन की सांस ली। मेरी हालत देखकर बिचौलिये की आँखों में भी ‘मोटी नेग’ के आँसू आ गए।

मंगलवार, 11 अगस्त 2020

'आजादी तूँ और करीब आ जा'

आज राजस्थान पत्रिका मे पढ़े.


“मुझे आजादी चाहिए।”
“हमें तो उन्नीस सौ सैतालीस को ही अंग्रेजों से आज़ादी मिल गयी थी। फिर अब?”
“मुझे और आज़ादी चाहिए। आज़ादी मिलने के बाद कुछ नियम भी बना दिये गए, उसे संविधान कहा गया। मुझे इन नियमों से भी आज़ादी चाहिए, हाँ।”
 “जीवन में कुछ नियम तो होने ही चाहिए, तुम इतनी ज्यादा आज़ादी लेकर क्या करोगे?”
“मुझे खुले आम सड़क पर गाली देने का मन करता है। लड़कियों को देखकर उन्हें छेड़ने का जी चाहता है। डाक्टरों, नर्सों, पुलिस, भीड़ आदि पर पत्थर फेंकने की इच्छा करती है। अपनी गाड़ी को सड़क  के बीचों-बीच खड़ी करने को मन मचलता है। कोई टोके तो उसे ठोंकने को मैं हमेशा तैयार रहता हूँ। किसी को गोली से मारने का मन हो तो अपने मन को मार नहीं सकता। मन के हिसाब से देश के नियमों की किताब पलट देना चाहता हूँ। मन चंचल तो नियम भी चंचल, है न ?”
 “इसे आज़ादी थोड़े कहतें हैं। पूरी आबादी ऐसे ही करने लगे तो हो गया बंटाधार! मन को काबू में रक्ख।”
“काबू? मन है तो है, बस। मुझे तो राह चलते इधर-उधर थूकने का भी मन करता है। खासकर जहाँ ‘थूकना मना है’ का बोर्ड लगा हो। कई बार ‘मना’ शब्द पर ही मैं पान की पीक ’पुच्च’ से फेंक देता हूँ। कितना मज़ा आता है, क्या बताऊँ? इसी तरह ‘जहाँ मूतना मना है’ लिखा होता है, वहाँ खड़ा होकर अपना काम जरूर कर देता हूँ। कितनी मुश्किलों से तो आज़ादी मिली है, इतना भी न करें तो धिक्कार है आज़ादी पर।”
“तो जानवरों और इन्सानों की आज़ादी में क्या फर्क हुआ? वह चार पैरों से चलता है और तुम दो पैरों से, बस।”
“मुझे जानवर न कहो। अतिमनुष्य कहो। नीत्से ने कहा है जो मनुष्य के आगे की सोचे वह अतिमनुष्य है। यही विकासवाद का सिद्धान्त है - बंदर, मनुष्य और अतिमनुष्य। हमें विकास करना है। आज़ादी चाहिए...और आज़ादी... और, और आज़ादी...बिना नियम वाली पूरी आज़ादी, हाँ।”
“जिन कामों के लिए तुम्हें और आज़ादी चाहिए, वे काम तो कुछ लोग दशकों से कर रहें हैं। किताबी नियमों से क्या होता है?”
  वह शराबखाने चला गया। वहाँ से झूमते हुये निकला और सड़क पर जा रही एक युवती को घसीट कर अपनी गाड़ी में बिठा दिया। सड़क के बीचों-बीच पूरे स्पीड से उसने गाड़ी दौड़ायी। रास्ते में सुनसान जगह पर आधे घंटा रुका। युवती की कुछ चीखें निकलीं। अस्त-व्यस्त हालत में इसे बाहर फेंक कर वह युवक चल पड़ा। कुछ जगहों पर रोक कर अपने पास रखे पत्थर के टुकड़ों को डाक्टर, नर्स, पुलिस और भीड़ पर फेंका। आगे चलकर अपनी बंदूक निकालीं। गोलियों से दो-चार लोगों को भूना और घर जाकर पूरी तसल्ली के साथ गहरी नींद में सो गया। 
 अगली सुबह अचानक दहशत भरी तेज़ आवाज़ से उसकी नींद खुल गयी। सामने वाली दोनों खिड़कियों के शीशे टूट कर चकनाचूर हो गए थे। शोकेस में रखी क्रॉकरी फर्श पर टूटकर बिखरी हुयी थी। उसने धीरे से कदम आगे बढ़ाए पर पैर में टुकड़े चुभ ही गए। खून की धाराएँ बह निकलीं फिर भी लड़खड़ाते हुये उसने खिड़की से नीचे देखा। एक युवक सड़क के बीचों-बीच झूमते हुये चल रहा था। उसके हाथ में पत्थरों की थैली थी। वह चारों तरफ पत्थर फेंक रहा था। खिड़की से झाँकने वाला युवक थोड़ी देर शांत रहा फिर वह खूब तेजी से ’अरे,बहन...”  चिल्लाया। इसके बाद उसके सिर पर भी एक पत्थर का टुकड़ा उछल कर लग गया। दिमाग सन्नाटे में चला गया और वह धम्म से नीचे गिर पड़ा। शायद उसने मंदिर जाती अपनी बहन को चीखते हुये देख लिया था जिसे पत्थर वाला युवक घसीट कर एक कोने में ले जा रहा था